नई दिल्ली, 4 फरवरी। भारत के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने कमेंट्री करने की संभावनाओं पर लगभग विराम लगा दिया है। धौनी का कहना है कि वह आंकड़ों के मामले में खुद को मजबूत नहीं मानते और यही वजह है कि वह इस भूमिका में खुद को फिट नहीं पाते। संन्यास के बाद ज्यादातर क्रिकेटर कमेंट्री की राह चुनते हैं, लेकिन धौनी इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
धौनी की कप्तानी में भारत ने आईसीसी की तीन बड़ी ट्रॉफियां जीतीं। हालांकि, 2020 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह खेल से जुड़े मुद्दों पर कम ही सार्वजनिक रूप से बोले हैं। मौजूदा समय में उनका क्रिकेट से जुड़ाव मुख्य रूप से आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स के लिए खेलने तक सीमित है।
कमेंट्री एक नाजुक कला
यूट्यूब पर स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर जतिन सप्रू के साथ बातचीत में धौनी ने कहा कि कमेंट्री करना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। उनके मुताबिक, खेल का आंखों देखा हाल सुनाने और खिलाड़ियों की आलोचना करने के बीच की रेखा बेहद बारीक होती है।

उन्होंने कहा कि कई बार कमेंट्री करते हुए यह एहसास भी नहीं होता कि कही गई बात किसी खिलाड़ी या टीम को गलत तरीके से प्रभावित कर सकती है। ऐसे में जरूरी है कि अगर किसी गलती की ओर इशारा करना भी हो, तो उसे शालीन और संतुलित भाषा में पेश किया जाए।
आंकड़ों से दूरी
धौनी ने साफ स्वीकार किया कि आंकड़े याद रखना उनकी ताकत नहीं रही है। यहां तक कि उन्हें अपने व्यक्तिगत रिकॉर्ड भी ठीक से याद नहीं रहते। उन्होंने कहा कि कई ऐसे लोग हैं जिन्हें हर युग के खिलाड़ियों के आंकड़े जुबानी याद होते हैं, लेकिन वह खुद उस श्रेणी में नहीं आते।
बोलने से ज्यादा सुनना पसंद
अपने खेल करियर में कई बड़े और कड़े फैसले लेने वाले धोनी ने बताया कि निजी जीवन में वह खुद को अच्छा श्रोता मानते हैं। अगर किसी विषय की जानकारी नहीं होती, तो वह बोलने के बजाय सुनना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि इससे सीखने का मौका मिलता है।

फोन पर बात करने में असहज
धौनी ने मुस्कराते हुए यह भी स्वीकार किया कि फोन पर बातचीत करना आज भी उनके लिए सहज नहीं है। आमने-सामने बैठकर बात करना उन्हें ज्यादा पसंद है, क्योंकि फोन पर सामने वाले के हाव-भाव नहीं दिखते। मजाकिया लहजे में उन्होंने कहा कि यह एक आदत है जिसे सुधारना चाहिए था, लेकिन उन्हें खुशी है कि वह अब तक नहीं सुधरी।