पटना। अपने दौर के इलाहाबाद के स्टार क्रिकेट खिलाड़ी व खेल पत्रकार आलोक चतुर्वेदी हम सबों के बीच नहीं रहे। आलोक चतुर्वेदी का कैंसर के कारण निधन हो गया। आलोक चतुर्वेदी ने पटना के दैनिक जागरण में खेल पत्रकार के रूप में बहुत दिनों तक काम किया था। वे काफी मृदुभाषी और सुलझे हुए व्यक्ति थे। आलोक चतुर्वेदी के असामायिक निधन से बिहार खेल जगत भी शोकाकुल है। खिलाड़ी से लेकर खेल पदाधिकारियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और साथ में उनके परिवार को इस दुख की घड़ी को सहने की शक्ति प्रदान करे।
आगे पढ़ें पत्रकार उन्मुक्त त्रिपाठी ने स्मृति शेष में क्या लिखा है-
आलोक #चतुर्वेदी
यही नाम तो था मेरे मित्र का, “था” इसलिए कि अब इस दुनिया मे नही रहा तो “था” ही बोलना पड़ेगा, काल के गाल ने असमय ही निगल लिया मेरे मित्र को , और अफसोस इस बात का की आखिरी वक्त में मिलने की कौन कहे आखिरी दर्शन भी नसीब नही हुआ, प्रकृति की कैसी क्रूरता है ये? कैसा न्याय है ये ?
बनारस चौबेपुर का जन्म और इलाहाबाद में पला बढ़ा अपने समय का क्रिकेट का ब्रांड अम्बेसडर था वो, चौबे खानदान का हीरो , कौन नही जानता था उसको इलाहाबाद में बाबा और आलोक बाबा के नाम से , ऐसे ब्यक्ति की ऐसी गुमनाम मौत कैसा निर्णय था ईश्वर का ये, मन आहत है , ह्रदय द्रवित है, दिल उस से मिलने के लिए बेचैन है कहाँ जाऊं , कहाँ ढूढू, किस से पूछूं कौन बताएगा । शायद यही उसका प्रारब्ध था यही उसकी नियति थी यही उसका भाग्य था कि जिसके अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल होते उसका पता भी नही चला किसी को।
क्रिकेट की दुनिया में 5 साल जूनियर नेशनल खेलना, वीनू मांकड़ औऱ सी के नायडू की कैप्टनशिप, कई स्तरीय खिलाड़ियों के साथ कैम्प करने के बाद भी क्रिकेट में राजनीति के समावेश चलते चयन न पाना ,सफल न हो पाना ही उसके जीवन का काला समय था। बहुत ही क्षुब्ध था वो इस बात से की इतनी क्रिकेट खेलने के बाद भी उसके हाँथ कुछ भी नही आया था।
पर फिर भी हार न मानना जीवन को उन ऊंचाइयों पर ले जाने के बारे में सोचना बंद नही किया था उसने जिस पर लोग पहुँचने की कल्पना भी नही कर सकते। उसके जीवन के संघर्षों को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ सिर्फ शब्दों से उसके ब्यक्तित्व को उजागर नही कर सकता, चाहे वो क्रिकेट की दुनिया हो, अध्यात्म की दुनिया हो या फिर पत्रकारिता की जिस भी क्षेत्र में गया बेहतर ही रहा। किसी मित्र का परिचय तो उस से अच्छा कोई दे ही नही सकता था, बोलने की अजीब कला थी उसमे आकर्षक ब्यक्तित्व का धनी था पर अफसोस अब नही मिला जा सकता उस से , मिलने के लिए मरना पड़ेगा पर शायद जीवित ब्यक्ति के लिए स्वयं से मर जाना आसानी से संभव नहीं।
बहुत याद आओगे आलोक चौबे😢ऐसा नही करना चाहिए था मित्र कम से एक फ़ोन तो करते याद तो करते, ऐसा कभी नही हुआ कि मैं मधवापुर से गुजरा होऊं और तुमको याद न किया हो और तुम एक फ़ोन भी नही कर सके , अरे कुछ नही कर पाता तो तुम्हारे आखिरी वक्त में तुम्हारे साथ कुछ समय तो बिता ही लेता और विश्वास कर पाता कि अब तुम इस दुनिया मे नही हो पर अब कैसे विश्वास होगा कि तुम इस दुनिया मे नही हो जब आखिरी वक्त में तुम्हे देखा ही नहीं।
डेढ़ महीने अस्पताल में रहे और पूरे इलाहाबाद में किसी को खबर ही नही , कैंसर हो गया और किसी को बताया तक नही कैसे संभव हो गया ये सब, एक महीने में तीन बार लखनऊ गया पता होता तो क्या मिलने भी न आ पाता, अभी परसों भी फ़ोन किया था स्विच ऑफ था ,शायद तुम्हे जाने की जल्दी थी चले गए छोड़ गए सभी मित्रों को सिर्फ याद करने के लिए।
बहुत याद आएगी मित्र ,तुम तुम्हारी स्मार्टनेस , तुम्हारा हंसता हुआ चेहरा, तुम्हारा लासा, तुम्हारी घंटी, तुम्हारा वो अबे , तुम्हारा वो परिचय कराने का अंदाज़ जिसमे तुम दोस्तों को अम्बानी से कम नही बताते थे, तुम्हारा वो घर तुम्हारी वो गालियां , और भी बहुत कुछ , पर होनी को कौन टाल सकता है मित्र, प्रकृति के सामने हर इंसान निर्जीव और बेबस है।
ईश्वर आपको श्री चरणों मे स्थान दे इस से ज्यादा लिख नही पाऊंगा। विनम्र
उन्मुक्त त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से साभार