Home Slider स्मृति शेष : पोलियो को हरा कर चार खेलों के निर्णायक बने थे असीम चक्रवर्ती

स्मृति शेष : पोलियो को हरा कर चार खेलों के निर्णायक बने थे असीम चक्रवर्ती

by Khel Dhaba
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हौसला और जुनून अगर मन में हो तो कोई भी काम कठिन नहीं हो सकता है। ऐसा कुछ किया था असीम चक्रवर्ती जो अब हमारे बीच में नहीं रहे। असीम चक्रवर्ती ने वह कर डाला था जो कोई आम आदमी करने के लिए सोचता भी नहीं है। इन्हीं कामों की बदौलत उन्होंने अपने आपको न केवल बिहार बल्कि देश के खेल जगत में अपने आपको स्थापित किया था।

उनका एक पैर बचपन से ही पोलियोग्रस्त था। इसके बाद भी उन्हें खेल में रुचि थी। उन्होंने सबसे पहले क्रिकेट खेलना शुरू किया था। पटना के लोकल टूर्नामेंट खेले। इसके बाद टेबुल टेनिस खेला। इन खेलों की बारिकियां सीखीं। इस दौरान उन्हें किसी ने कहा कि इतनी जानकारी है तो खेल प्रतियोगिताओं के निर्णायक क्यों नहीं बन जाते हैं।

किसी के द्वारा मजाक में कही गई यह बात जंच गई। 1965 में सबसे पहले क्रिकेट की अंपायरिंग शुरू की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्रिकेट में पटना सहित संयुक्त बिहार में होने वाले कई मैचों में अंपायरिंग की। कोई पूछता कि आप पैर से लाचार हैं, फिर भी 40-40 ओवर के मैच में कैसे अंपायरिंग करा लेते हैं। वे कहते मन में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कोई भी काम किया जा सकता है।

टेबुल टेनिस की अंपायरिंग में बहुत आगे बढ़े
उनका टेबुल टेनिस से ज्यादा लगाव था, इसीलिए उसके निर्णायक में हाथ आजमाया। लोकल टूर्नामेंट के बाद राज्यस्तरीय टूर्नामेंटों में अंपायरिंग की। सफर आगे बढ़ता गया। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में अंपायरिंग। धीरे-धीर सपने उनके सच होने लगे। अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लालसा लगने लगी। इसका भी मौका मिल गया। कोलकाता में हुए विश्व टेबुल टेनिस में असीम चक्रवर्ती को जब अंपायरिंग कराने का मौका मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। इतने लंबे सफर में खेल की कई दिग्गज हस्तियों से मिलना जुलना हुआ। इन सबों से बहुत कुछ सीखने को मिला।

बिलियर्ड्स-शतरंज में भी महारत हासिल
असीम चक्रवर्ती ने बिलियर्ड्स और शतरंज में भी निर्णायक की भूमिका अदा की है। पटना में हुए राष्ट्रीय बिलियर्ड्स चैंपियनशिप में वे अंपायर रहे। इसके बाद लगातार पांच साल तक विभिन्न जगहों पर हुए बिलियर्ड्स चैंपियनशिप में निर्णायक रहे। शतरंज के राष्ट्रीय ‘बी’ और राष्ट्रीय अंडर-25 टूर्नामेंट में ये आर्बिटर रहे।

पेशे से शिक्षक असीम चक्रवर्ती  के पिता आर्मी में थे। पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के बाकुड़ा इनका पैतृक गांव है। आर्मी से अवकाश ग्रहण करने के बाद उनके पिता पटना चले आए। यहीं प्राइवेट नौकरी की।

असीम की स्कूली शिक्षा राम मनोहर राय सेमिनरी स्कूल में हुई थी। इसके बाद वाणिज्य महाविद्यालय से उच्च शिक्षा ली। वर्ष 1965 से 1981 तक प्राइवेट नौकरी की।

1982 में इन्हें बिहार सरकार में शिक्षक की नौकरी मिल गई थी। 25 साल तक सगुना मोड़ के पास स्थित मिड्ल स्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में काम किया था। इसके बाद मुसल्लहपुर हाट के मिड्ल स्कूल में चले आए था। नौ साल पहले यहीं से रिटायर हुए। शिक्षक्ष पेशे से रिटायर होने के बाद उनका खेल से जुड़ाव बना रहा। पटना में होने वाली हर गतिविधियों में शामिल होते और अपनी जिंदगी को इंज्वाय करते। हाल के वर्षों में पैर से ज्यादा लाचार हो जाने के बाद उनका इधर-उधर आना जाना बंद हो गया था।  असीम चक्रवर्ती का यों हम सबों को छोड़ कर जाना पूरे बिहार खेल जगत को कमी महसूस करायेगा।

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