अरविंद कुमार सिन्हा, फिडे मास्टर
पटना। गत चर्चा में आई घटनाओं की कड़ियां जोड़ते हुये थोड़ा पहले अर्थात1990 से ही चर्चा शुरू करते हुये यह जानें कि देश में1990 से आयु वर्ग यथा-अंडर-7,9,11,13,17 तथा युवा अंडर -25 की प्रतियोगिताएं बालक और बालिका वर्ग में आयोजित करने की शुरूआत हुई। पहले सब-जूनियर और जूनियर वर्ग की प्रतियोगिताएं हुआ करतीं थीं। इतने सारे मैच करा लेना सहज न था क्योंकि इसमें बहुत अधिक धन और आयोजकों की आवश्यकता पड़ती। उमर कोया,जो 1989 के महासंघ के चुनाव में मैनुअल एरन की टीम से पहली बार सचिव बने थे,ने अपनी महत्वाकांक्षा, दूरदर्शिता और कल्पनाशीलता का परिचय देते हुये,संविधान मेंपहले तो ‘डोनर’ प्रवेश का प्रावधान लाया ताकि प्रतियोगिता कराने के लिए महासंघ तथा राज्य संघ में अधिक धन राशि की व्यवस्था हो जाये फिर आयोजकों की कमी न हो,इसके लिए चेस एकेडमी और क्लब को महासंघ से सीधी मान्यता देने की व्यवस्था की। एकेडमी और क्लब अपने बैनर तले छोटी आयु के बच्चे-बच्चियों के प्रशिक्षण तो देते ही,उन्हें राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं मेंअपने खिलाड़ियों के प्रवेश का कोटा भी दिया गया जो राज्य इकाई के कोटे से आधा था। फिर क्या था, दर्जनों राष्ट्रीय चेस एकेडमी और क्लब बात ही बात में खुल गए और महासंघ में धन, खिलाड़ी, आयोजक, यहां तक कि प्रशिक्षक-किसी की अब कोई कमी न थी।

कोया की यह डोनर’ प्रवेश योजना इतनी सफल और लोकप्रिय रही कि जिसके मोहसे आज भी महासंघ उबर नहीं पाया है। इस प्रकार महासंघ में समृद्धि लाने का श्रेय कोया को जाता है परंतु इसके बाद ही कोया ने अपने अगले चुनाव, 1993 से ठीक पूर्व अपने दोबारा चुने जाने में जो दो-तिहाई बहुमत की जो अनिवार्यशर्त (बाधा) थी,उसे संविधान से हटाकर आगे पद पर बने रहने का रास्ता बना लिया। इतना ही नहीं,बाद में क्लब और एकेडमी को महासंघ के चुनाव में एक वोट देने का अधिकार भी दे दिया। दूसरे शब्दों में,राज्य इकाईयों के समानान्तर वोट-शक्ति का गठन। संविधान में ये संशोधन कोया ने तब किये, जब मैनुअल एरन दुबई के राष्ट्रीय प्रशिक्षक की दो वर्षों की नियुक्ति पर थे,जिसे कोया ने ही दिलवाया था। इस प्रकार उमर कोया कवच-कुंडल से लैस होकर आगे के तीन चुनाव लगातार जीतेऔर लगभग 15 वर्षों तक सचिव रहे। आपको बता दें कि कोया 1994 में ही विश्व महासंघ के उपाध्यक्ष चुने गए थे जिस पद पर वे भारतीय महासंघ से हटने तक रहे। इधर बिहार शतरंज में भी नए खिलाड़ियों की नई पौध की कलियाँ अब प्रस्फुटित होने लगी थीं जिनमें पटना के संतोष कुमार सिन्हा,सुधीर कुमार सिन्हा, सुनील, विनय कुमार सिन्हा, मुजफ्फरपुर के विजयेश नन्द केउलियार, सुबोध नन्द लाल,अजय कुमार सिन्हा, विनय, उदय, छपरा से नन्द किशोर श्रीवास्तव, समस्तीपुर से जितेंद्र कुमार चौधरी,जमशेदपुर से प्रीतम सिंह, राहुल और रोहण शांडिल्य, दिवाकर प्रसाद सिंह,अमित मेडड़ा जैसे नाम प्रमुख है जो गत पीढियों की चर्चा में वर्णित अपने अग्रजों से दो-दो हाथ करने को अग्रिम पंक्ति में तैयार खड़े थे।

इधर सचिव बनते ही खान साहब की जिम्मेवारियाँ भी अब बढ़ चलीं थी। शायद उनके लिये कोषाध्यक्ष अजय नारायण शर्मा से आयोजन के लिए पैसा निकलवा पाना भी कठिन था। खान साहब ने1991 की राज्य प्रतियोगिता जैसे-तैसे भुरकुण्डा (हजारीबाग) में कराई। कहते हैं कि खिलाड़ियों के रहने की व्यवस्था भी माकूल नहीं थी क्योंकि कईयों के बदन जंगली कीड़े के काटने से लाल हो गए थे। उस प्रतियोगिता में संतोष कुमार सिन्हा विजेता बन कर निकले जबकि उनके बड़े भाई सुशील कुमार सिन्हा ने दूसरा स्थान पाया। टीम के नए सदस्यों में विजयेश नन्दकुलियार और पुराने में, बोकारो के वरीय खिलाड़ी आनंद कुमार थे।

कहते हैं कि खान साहब ने तब अब्दुल बारी सिद्दीकी को बिहार शतरंज का अध्यक्ष बना लिया था पर कब और कैसे,यह किसी को शायद ही पता हो। ललमटिया की प्रतियोगिता में तो कहते हैं कि खिलाड़ियों को पुरस्कार तक नहीं दिये गए। खिलाड़ियों में आक्रोश और असंतोष भड़का और वे सिद्दीकी साहब तक फरियाद लेकर पहुंच गए। यहां तक कि यह बात समाचार पत्रों तक में छपी। संभवत: इसी घटना के बाद सिद्दीकी साहब ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया।1992 की ललमटिया राज्य प्रतियोगिता संतोष कुमार सिन्हा ने जीती।
1993 में कोया से आधिकारिक मान्यता मिलने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज खान साहब को मुजफ्फरपुर के सचिव और उभरते आयोजक राजीव कुमार सिन्हा का साथ ज्यादा रास आया जहां 1993 की राज्य प्रतियोगिता आयोजित हुई। उस राज्य प्रतियोगिता के विजेता समस्तीपुर के जितेंद्र कुमार चौधरी बने।

आपने भी गौर किया हो कि खान साहब ने पटना की राजनीति से बचते हुये दूर कहीं राज्य प्रतियोगिता कराने में ही भलाई समझी। इतना ही नहीं,पटना जिला संघ,जिसके सचिव खान साहब ही थे,नेअपने चेले मो शमीम को पटना जिला संघ थमा दिया था। सभी जानते थे कि शमीम न तो खिलाड़ी थे और नही आयोजक,बस जो खान साहब कहते वही करते। वस्तुत: खान साहब ने उन्हें कबड्डी से लाकर शतरंज का सचिव बना दिया था।1990 आते आते क्रेसेंट क्लब भी बंद हो चुका था। आपको आश्चर्य होगा कि बिहार टीम को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भेजे जाने तक का खर्च अर्थात रियायती रेल भाड़ा, खिलाड़ियों का प्रवेश शुल्क का भार भी आयोजक जिला संघों पर डाल दिया गया था। दूसरे शब्दों में यदि आपने कोई राज्य प्रतियोगिता कराई, तो आयोजन का समस्त व्यय, पुरस्कार राशि तो आप देना ही है, चयनित खिलाड़ियों का रेल भाड़ा और प्रवेश शुल्क भी आपको ही देना होगा। यह रीति लगभग 20 वर्षों तक चली। पर शतरंज खिलाड़ी ऐसी स्थिति में कहां मानने वालेथे? 1994 में मुजफ्फरपुर जिला द्वारा आयोजित रेटिंग टूर्नामेंट के दौरान पटना के वरीय खिलाड़ियों और जमशेदपुर से आए नीरज मिश्रा एवं अन्य ने खान साहब को घेरा और राज्य संघ के संविधान और चुनाव की मांग कर दी। खान साहब को कन्नी काटते देख वहीं पर संविधान का प्रारूप तैयार हुआ,और एआरखान,राजीव सिन्हा सहित सभी खिलाड़ियों के दस्तखत हुये और आगे चुनाव कराने की बात हुई। तय हुआ था कि राजीव सिन्हा उस टूर्नामेंट के बाद उक्त सभा बही और संविधान के प्रारूप अरविंद के पास आगे समुचित कार्रवाई के लिए देंगे। पर ऐसा हुआ नहीं और चुनाव चुपचाप करा लिए गए। शायद कोई कमजोर नस पकड़ी गई थी।

वैसे तो छपरा जिला का नाम वाई पी श्रीवास्तव के आने से अनजाना न रह गया था और छपरा में शतरंज की अनौपचारिक गतिविधियां तो थी,परंतु जिला संघ की विधिवत स्थापना 1993 में की गई थी। अध्यक्ष थे श्यामदेव सिंह, सचिव जितेंद्र बहादुर और कोषाध्यक्ष बने थे मनोज कुमार वर्मा’संकल्प’। 1994 में वाई पी श्रीवास्तव के सहयोग से खान साहब द्वारा ऑल बिहार शतरंज संघ से मान्यता मिली जिसमें भगवान बाजार, छपरा थाना प्रभारी मोहम्मद कालीमुद्दीन अध्यक्ष, मनोज कुमार वर्मा सचिव और रविशंकर बहादुर कोषाध्यक्ष बने। छपरा में एक राज्यस्तरीय खुली प्रतियोगिता1995 हुई थी पर दूसरी खुली प्रतियोगिता बृहद रूप में1996 में आयोजित हुई,जिसमें प्रदेश भर के सभी नामी खिलाड़ियों के बीच विजेता बनने का गौरव मिला था रिजर्वबैंक,पटना के संजीव कुमार को। तब तक छपरा की युवा प्रतिभा राहुल संगमा भी तैयार हो चले थे जिन्होंने बिहार राज्य का पुरजोर प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय आयु वर्ग की प्रतियोगिताओं में किया और बाद में शतरंज को ही अपना कैरियर बनाने हेतु बिहार छोड़कर दिल्ली जा बसे जहां बाद मेंअंतर्राष्ट्रीय मास्टर भी बने।
अर्से बाद 1994 की राज्य प्रतियोगिता पटना जिला के तत्वावधान में सायंस कॉलेज में आयोजित हुई जिसके विजेता बने जमशेदपुर के प्रीतम सिंह। प्रीतम सिंह ने बाद में रांची में आयोजित 1996 की राज्य प्रतियोगिता तथा पूर्वी सिंहभूम जिला के तत्वावधान मेंआयोजित 1998 की राज्य प्रतियोगिताएं भी न सिर्फ जीतीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूत खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाई।1993 के बिहार चैंपियन जितेंद्र चौधरी जो समस्तीपुर के जिला सचिव भी थे,ने1995 की राज्य प्रतियोगिता समस्तीपुर जिला के शाहपुरपटोरी ग्राम में कराई। वहाँ वैसे तो कई खेल प्रेमी तथा खिलाड़ी थे ही,जिनमेंअनंत नारायणदास,मोहलीम,प्रभास तिवारी,रणधीरसिन्हा,गंगा रामदास,प्रहलाद माहेश्वरी तथा दिनेश चौधरी आदि प्रमुख थे। पर राज्य संघ की मान्यता तो वहाँ के प्रतिभावान खिलाड़ी जितेंद्र कुमार चौधारी ने सचिव के रूप में1989 मेंली। बिलकुल ग्रामीण परिवेश मेंआयोजित1995 की वह प्रतियोगिता कई मायनों में इकलौती कही जाएगी। एक ही जगह में रहने,खाने और खेलने की प्रशंसनीय व्यवस्था और उससे बढ़कर स्थानीय ग्रामवासियों का आतिथ्य और हृदय स्पर्शी सेवा भाव खिलाड़ियों की स्मृति में बसी हैे वह प्रतियोगिता जमशेदपुर के दिवाकर प्रसाद सिंह ने जीती जबकि उपविजेता बने जितेंद्रचौधरी।
अगले वर्ष 1996 की राज्य प्रतियोगिता का आयोजन रांची में किया गया जहां के सचिव जय कुमार सिन्हा ने फिर से अपने अच्छे आयोजक होने का परिचय दिया। उस प्रतियोगिता में जमशेदपुर के प्रीतम सिंह विजेता बने और साथ ही,चक्रधरपुर के युवा खिलाड़ी अमित कुमार मेडड़ा ने टीम में जगह बनाई। अमित मेड्डा स्वयं तो अच्छे खिलाड़ी थे ही बाद में दीपसेन गुप्ता के प्रशिक्षक के रूप में ख्याति पायी। दीप सेनगुप्ता बाद में,ग्रैंडमास्टर भी बने।

उस वर्ष अर्थात 1996 की राष्ट्रीय बी प्रतियोगिता तमिलनाडु में थी जहां बिहार टीम के खिलाड़ियों ने कोया से मिलकर खान साहब के आलोकतांत्रिक कार्यशैली पर बात की। फिर कोया के सलाह पर राष्ट्रीय बी प्रतियोगिता में भाग ले रहे खिलाड़ियों से लिखित शिकायत दी गई,आश्वासन भी मिला पर साल बीतने को आया परंतु न तो खान साहब की कार्यशैली सुधरी और न कोया ने ही कोई कार्रवाई की। इस आक्रोश की आंच से मुजफ्फरपुर के सचिव राजीव सिन्हा सहित अन्य पदाधिकारी भी अछूते न रहे जिनकी बिहार शतरंज पर ख़ासी पकड़ थी और संघ के अपारदर्शी संचालन के सहयोगी बन बैठे थे। कहते हैं कि खिलाड़ियों से रूखे-व्यवहार की शिकायतों और निरंकुश कार्यशैली से बिहार शतरंज में तीव्र असंतोष व्याप्त हो चुका था। यहाँ तक कि खान साहब ने मुजफ्फरपुर में एक प्रतियोगिता समारोह मेंपधारे त्रिपुरारि शरण (आईएएस) को वहीं बिहार शतरंज का अध्यक्ष घोषित कर दिया। कुछ आशा बंधी,पर सत्तासीन पक्ष उनसे लाभ ले सकने और कुछ बड़ा करा पाने में विफल रहा। नतीजा हुआ कि1997 में बिहार शतरंज में फिर एक बार भूचाल आया और अनेकों जिला संघ ने मिलकर समानान्तर राज्य संघ तक बना लिए जिसके सचिव बने अजीत कुमार सिंह। समानांतर राज्य प्रतियोगिता का आयोजन पटना और लखीसराय में हुआ।
बिहार के लगभग सभी शीर्षस्थ खिलाडी,वाईपीश्रीवास्तव, संतोषकुमारसिन्हा, प्रीतम सिंह जैसे168 खिलाड़ी पटना में खेले जबकि खान साहब के लखीसराय में मात्र 42। पूर्वी सिंहभूम जैसा सक्रिय जिला संघ भी सत्तासीन दल के साथ न था। पटना के विजेता बने जमशेदपुर के प्रीतम सिंह जबकि लखीसराय के विजेता बने समस्तीपुर के जितेंद्रकुमारचौधरी। विजयेश नंदकुलियार की कप्तानी में पटना से चुनी गई टीम राष्ट्रीय बी के लिए कालीकट गई। जिस दिन बिहार से टीम निकली, उसी रात अरविंद कोलकाता के लिए निकले। वहाँ महासंघ के कोषाध्यक्ष सोमन मजूमदार से मिले,संयुक्त सचिव गौरांग मेहता और कोया से भी फोन पर बात की। परंतु कोया ने खान साहब द्वारा भेजी गई टीम को ही खेलने दिया। अलबत्ता,महासंघद्वारा बिहार के खिलाड़ियों के लौटा दिये जाने की बात देश भर में फैल गई।
उसी के बाद1997 का महासंघ का चुनाव हुआ जिसमें कोया सचिव और खान साहब संयुक्त सचिवबने। और साथ ही,यह भी तय हो गया कि जब तक कोया रहेंगे,खान साहब बने रहेंगे। भारतीय महासंघ मे संयुक्त सचिव बनाए जाने के बाद खान साहब का कहना ही क्या था। त्रिपुरारि शरण की जगह 1998 में मुजफ्फरपुर के रमेश मोटानी अध्यक्ष बन गए थे। लगभग दो-तीन वर्षों बाद मोटानी के मुजफ्फरपुर छोड़ने के बाद 2002 से राजीव कुमार सिन्हा से कार्यकारी अध्यक्ष बने रहे।
कल पढ़ें इसका दूसरा भाग।