Thursday, January 29, 2026
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बिहार शतरंज की चौथी पीढ़ी की कहानी, कुछ आंखों देखी और कुछ सुनी जुबानी

by Khel Dhaba
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अरविंद कुमार सिन्हा, फिडे मास्टर
पटना।
गत अंक की कहानी में हम यह देख चुके थे कि किस प्रकार खिलाड़ियों का एक बहुत बड़ा वर्ग, विशेष कर पटना का जहां शतरंज की गतिविधियां मृतप्राय हो गई थी, संघ के सत्तासीन पक्ष के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था | विजयेश नन्द्केउलियार ( जो उस समय मुजफ्फरपुर से आ कर पटना में रहने लगे थे ) भी उनमें थे जो कालीकट से बैरंग लौटे थे | वहाँ से लौटते ही उन्होने पटना चेस क्लब को सक्रिय किया
जिसके सचिव थे संजीव कुमार | नंदकेउलियार ने पटना चेस क्लब के बैनर तले ग्रां पी शतरंज नाम से 1997 से 2001 तक लगभग 5 से 6 प्रतियोगिताएं लगातार कराई जिसके कारण पटना के खिलाड़ियों को नियमित खेल-प्लैट्फॉर्म नसीब हो पाया। ग्रां प्री शतरंज की लोकप्रियता का यह आलम था कि खिलाड़ी प्रतियोगिता की बाट जोहते । अनेक विभूतियां—साईन्स कॉलेज के प्रिंसिपल से लेकर खेल विभाग के सचिव अंजनी कुमार सिंह तक पारितोषिक वितरण समारोह में आती गईं | खान साहब तो पटना मे ही रहते पर न तो उनकी कोई परवाह की जाती और न प्रतियोगिता मे बुलाया जाता | इससे परेशान खान साहब पटना जिला संघ से मो शमीम को हटा कर संतोष कुमार सिन्हा को सचिव बनाने को राजी हो गए | बाद में पटना चेस क्लब ने 2001 में मुजफ्फरपुर के एन एल एम चेस एकैडमी (भारतीय महासंघ से मान्यता प्राप्त) से मिल कर अखिल भारतीय फिडे रेटिंग प्रतियोगिता भी कराई जो बी एन कॉलेज में आयोजित की गई जिसमें नासिर अली जैसे वरीय खिलाड़ी भी आए थे | प्रतियोगिता में नासिर वजीह को प्रथम एवं सुधाकर बाबू, अतनु लाहिडी, नीरज मिश्र, सप्तर्षि रॉय चौधरी, रवि कुमार और बी भौमिक को क्रमश: दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवां और छठा स्थान मिला।

कहना न होगा राज्य संघ के प्रयासों पर आश्रित रहे बिना, बिहार शतरंज की उर्वरा भूमि में युवा खिलाड़ियों की कोंपलें फूटती, पल्लवित और प्रस्फुटित होतीं रहीं और कालचक्र की गति के अनुसार बगिया में खिलती-मुरझाती रहीं हैं | यह तो मानना भी होगा कि अपने आस-पास नई
उभर रही प्रतिभाओं के पुंसवन,परागन, सिंचन और संरक्षण में उस दौर के स्थापित खिलाड़ियों की निश्चित भूमिका रही होगी |

उस कालावधि में पटना में मनीष कुमार, राजेश कुमार, राकेश रंजन, कुणाल, समीर कुमार, वेद प्रकाश सिन्हा,विपल सुभाषी, रूपेश रंजन, रबीन्द्र कुमार, सुधीर कुमार सिन्हा, सौरव रूप, संजय वर्मा, सुनील कुमार सिन्हा , राजीव प्रसाद, उदय कुमार सिन्हा, आशुतोष कुमार, अजय कुमार सिन्हा, वेदप्रकाश, विनय कुमार सिन्हा, साकेत, विवेक आनंद , स्वपन मिश्रा, छपरा के राहुल संगमा, गया के राकेश अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, मुजफ्फरपुर के कुमार गौरव, आभाष कुमार, उभय रंजन, बेगुसराय के दीपक कुमार, अभय कुमार सिन्हा, राज कुमार चौहान, मानव कुमार, जयवर्धन शर्मा, प्रेमवर्धन, मनीष कुमार, लखीसराय के शिवप्रिय भारद्वाज, मुंगेर के देवव्रत सिंह, बिपलव रणधीर, खगडिया के जे के जवाहर, वीर कुमार, भागलपुर के शुभम कुमार, भोजपुर के विजय कुमार जैसे प्रमुख नाम हैं जिनमें से अधिकांश ने किसी न किसी अवसर पर राज्य प्रतियोगिता में चयनित होकर प्रदेश को गौरवान्वित किया है |

1998 के राज्य प्रतियोगिता जे आर डी टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, जमशेदपुर में आयोजित हुई जिसके विजेता जमहेदपुर के प्रीतम सिंह बने| पूर्वी सिंहभूम जिला संघ द्वारा आयोजित वह राज्य प्रतियोगिता अपनी बेहतरीन व्यवस्था और शानदार समापन के लिए याद की जाती है |
जितेंद्र चौधरी ने समस्तीपुर में एक बार फिर 1999 की राज्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जिसमें पटना के युवा खिलाड़ी विवेक आनंद विजेता बने वहीं संतोष कुमार सिन्हा को दूसरा स्थान मिला |
अगले शताब्दी वर्ष 2000 में मिलेनियम बिहार राज्य प्रतियोगिता अमित कुमार मेडड़ा की पहल पर उनके गृह जिला चक्रधरपुर में आयोजित हुई | वहाँ उमापद बटबायल ‘बाटू’ जैसे जुझारू सचिव थे | दोनों की जोड़ी ने आयोजन से कहीं आगे नए खिलाड़ियों को तैयार करने को जुट गए| 2000 की राज्य प्रतियोगिता के विजेता बने प्रतीक सेनगुप्ता, जबकि वाई पी श्रीवास्तव, प्रीतम सिंह, अमित मेडड़ा और संतोष कुमार सिन्हा को दूसरे से चौथे स्थान पर जगह मिली | प्रसंगवश, अंडर 18 की प्रतियोगिता भी साथ में ही आयोजित हुई थी जिसके
बालक वर्ग में क्रमश: प्रतीक सेनगुप्ता, राजेश कुमार, विवेक आनंद और राकेश अग्रवाल को टीम मे जगह मिली और विपल सुभाषी और दीप सेनगुप्ता को 5वे और 6ठे स्थान पर संतोष करना पड़ा| उसी साल पूर्वी सिंहभूम जिला द्वारा टाटा स्टील 38वीं राष्ट्रीय बी प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया जिसे जे आर डी टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में संचालित किया गया था |

सन 2000 के अंत में बिहार से अलग झारखंड पृथक राज्य बन गया | बहरहाल, झारखंड अलग होने के बाद 2001 में मुजफ्फरपुर में बिहार राज्य की प्रतियोगिता कराई गई जिसके विजेता दिवाकर प्रसाद सिंह बने, सुधीर कुमार सिन्हा, संतोष कुमार सिन्हा को क्रमश: दूसरा और तीसरा स्थान मिला | [ परन्तु सच तो यह है कि 2001 की झारखंड राज्य प्रतियोगिता धनबाद में आयोजित हुई थी जिसमें क्रमश: राहुल शांडिल्य, प्रीतम सिंह, रोहन शांडिल्य और दिवाकर प्रसाद सिंह को क्रमश: पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा स्थान मिला था | प्रश्न यह है कि तब दिवाकर प्रसाद सिंह बिहार और झारखंड दोनों में क्यों और कैसे खेले ? ]

वहीं 2002 की राज्य प्रतियोगिता राकेश और राहुल अग्रवाल के सहयोग से गया में आयोजित की गई जिसके विजेता संतोष कुमार सिन्हा बने तथा वाई पी श्रीवास्तव, संजय वर्मा और कुणाल को क्रमश: दूसरा,तीसरा, चौथा स्थान मिला | 2003 की राज्य प्रतियोगिता का आयोजन छपरा जिला संघ द्वारा सचिव मनोज कुमार वर्मा ’संकल्प’ के नेतृत्व में हुआ जिसके विजेता बने प्रमोद कुमार सिंह और दूसरे और तीसरे स्थान पर आए संतोष कुमार सिन्हा और वाई पी श्रीवास्तव | मनोज संकल्प तब बिहार संघ के कोषाध्यक्ष बन चुके थे |

2003 मे ही पटना में धर्मेंद्र कुमार के प्रयासों से अनिल सुलभ के नेतृत्व में बने ‘चेस ट्रैक’ क्लब ने राष्ट्रीय अंडर 25 प्रतियोगिता कराई | 2004 में यहीं पर राष्ट्रीय आर्बिटर का प्रशिक्षण एवं परीक्षा कार्यक्रम से आर्बिटर की बड़ी खेप तैयार हुई | महासंघ के उपाध्यक्ष एस एल हर्ष
(राजस्थान) की देख रेख में प्रशिक्षण सम्पन्न हुआ तथा अंतरराष्ट्रीय आर्बिटर दीपक सैगल मुख्य परीक्षक थे | राष्ट्रीय आर्बिटर डिग्री प्राप्त करने वालों में छपरा के मनोज संकल्प और सुनीत कुमार ,वैशाली के दिलीप कुमार भगत,किशनगंज के शंकर नारायण दत्ता, बेगुसराय के
हर्षवर्धन, भोजपुर के वीरेंद्र उपाध्याय, रोहतास के अमरंजय कुमार दूबे, पटना से उमेश राम और नन्द किशोर श्रीवास्तव आदि थे| इसके पूर्व ए आर खान 1984 में राष्ट्रीय आर्बिटर बने थे|

1993 में जमशेदपुर के जे के भुईयां अंतर्राष्ट्रीय आर्बिटर बने जबकि धर्मेंद्र कुमार 2004 में अंतर्राष्ट्रीय आर्बिटर बने | बहरहाल, 2004 की राज्य प्रतियोगिता वैशाली जिला संघ द्वारा बसावन सिंह इंडोर स्टेडियम, हाजीपुर में कराई गई | वैशाली जिला संघ का पुनर्गठन वैसे तो 2000 में हो गया था परंतु उसके सचिव दिलीप कुमार भगत ने 2004 में सीनियर राज्य प्रतियोगिता कराई जिसके प्रतियोगिता निदेशक थे सचिवालय के उमेश राम । 2004 के विजेता बने वाई पी श्रीवास्तव तथा सुधीर कुमार सिन्हा और वेद प्रकाश सिन्हा को क्र्मश: दूसरा और तीसरा स्थान मिला |

2005 की राज्य प्रतियोगिता मुजफ्फरपुर में कराई गई जिसके विजेता संतोष कुमार सिन्हा, विपल सुभाषी को दूसरा, राकेश अग्रवाल को तीसरा स्थान मिला| हमने यह जाना था कि पी टी उमरकोया 1997 में लगातार तीसरी बार भारतीय महासंघ के सचिव और दूसरी बार विश्व महासंघ के उपाध्यक्ष बनने के बाद भारतीय महासंघ में सर्वाधिक शक्तिसंपन्न व्यक्तित्व बन कर उभरे थे | कोया का कहा कानून था | 1993 तथा 1997 के चुनावों में अध्यक्ष बने ध्रुव मोहन सॉवनी समय बीतने के साथ, कोया, जो फिडे के उपाधयक्ष रहते आ रहे थे, की कार्यशैली से स्कूश नहीं थे और उन्होने तीसरी बार के लिए एन आई आई टी के प्रबंध निदेशक राजेन्द्र पवार, जो विश्वनाथन आनन्द के प्रायोजक भी थे, को अपनी जगह महासंघ के अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित कर दिया | दिल्ली के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में आम सभा हुई जहां अवांछित लोग बडी संख्या में घुस कर कोया के खिलाफ खड़े प्रत्याशी की जीत घोषित कर शोर करने लगे | स्थिति भाँप कर बैठक की अध्यक्षता कर रहे पी सी चतुर्वेदी, आई ए एस, बैठक स्थगित करते हुये कोया समर्थकों के साथ वहाँ से निकल गए |

कुछ दिनों बाद, चेन्नई में सम्पन्न हुए चुनाव में एन श्रीनिवासन अध्यक्ष और कोया सचिव बने | एन श्रीनिवासन इंडिया सीमेंट के मालिक और चेन्नई के बड़े उद्योगपति थे और क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से जुड़े थे | बाद में कोया ने खिलाड़ियों का निबंधन शुल्क तो बढ़ाया ही,और फिर न जाने उन्हें क्या सूझी कि खिलाड़ियों को पुरस्कार में दी जाने वाली राशि से कुछ प्रतिशत अंश महासंघ को दिये जाने का प्रस्ताव पास करा लिया| इस अजीबोगरीब फैसले से देश के सारे शीर्ष खिलाड़ी बिदक गए | कहते हैं कि 2004 में दिल्ली में आयोजित प्रतियोगिता के पारितोषिक वितरण समारोह में किसी खिलाड़ी ने कोया के सामने ही खुले मंच से विरोध कर दिया और आवेश से तमतमाए कोया वहाँ से बीच में ही निकल गए और बाद में खिलाड़ी के खेलने पर प्रतिबंध तक लगा दिया|

श्रीनिवासन द्वारा प्रतिबंध पर आपत्ति कोया को जरा भी न सुहाई और उन्होने संविधान में अध्यक्ष के अधिकारों में कटौती का प्रस्ताव तक ला दिया | फिर क्या था, एक बड़ा धड़ा कोया के विरोध में खुल्लम-खुल्ला खड़ा हो गया | मैनुअल एरन के नेतृत्व में कोया-काल में हुये संविधान विरोधी कार्यों, उनकी निरंकुश कार्यशैली तथा महासंघ के धन का राजशाही व्यय आदि एक-एक कर प्रकाश में लाये गए [जिसका हिन्दी अनुवाद अरविंद करते थे ]| बाद में महासंघ के दो अलग- अलग चुनाव हुये| जब खान साहब और राजीव सिन्हा से वोट हेतु संपर्क की कोशिश की गई तब दोनों का फोन बंद मिला | बहरहाल, मामला हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक गया जिसमें कई और मामले भी जुड़ते चले गए | अंतत: 2005 में कोर्ट की देख-रेख में चुनाव हुये जिसमें श्रीनिवासन अध्यक्ष, डी वी सुंदर, सचिव और भरत सिंह चौहान कोषाध्यक्ष चुने गए | [ तब तक बिहार में भी नई समिति चुन ली गई थी जो आगे चर्चा में आएगी | बिहार से नए अध्यक्ष बने संजीव कुमार महासंघ के उपाध्यक्ष बने ]

उक्त चुनाव से पूर्व बिहार के सत्तासीन गुट द्वारा 2005 में हाजीपुर में राज्य संघ का चुनाव की सार्वजनिक घोषणा [पहली बार] की गई क्योंकि महासंघ की ओर से भरत सिंह चौहान आने वाले थे | खान साहब के सत्ता-रथ की रास थामे रखने हेतु मुजजफ्फरपुर को आगे किया गया और आसन्न चुनौती को देखते हुये पटना में एक गुट पहले से तैयार खड़ा था | भरत सिंह चौहान के संग देर शाम बनी सहमति को सुबह चुनाव में पलटने की योजना तब ध्वस्त हो गई जब अगली सुबह भरत सिंह चौहान के बार-बार अरविंद से सचिव पद के लिए नाम पर नाम मांगे तथा काटे जाने पर अंत में अरविंद ने जब अजीत का नाम दिया | एन चुनाव में भी सत्तासीन पक्ष को एक सीट भी दिये जाने को कोई भी तैयार न हुआ | इस प्रकार सत्ताधारी गुट को तात्कालिक सफलता मिल तो गई पर किला हाथ से जाता रहा | बहरहाल, जब सभी हाजीपुर चुनाव स्थल पर पहुंचने को थे तो पता लगा कि खान साहब अभी-अभी वहाँ से निकल चुके थे | बहरहाल, खान साहब की अनुपस्थिति में और राजीव सिन्हा की अध्यक्षता में आम सभा की बैठक और 2005-09 के लिए चुनाव हुये जिसमें संजीव कुमार अध्यक्ष, अजीत कुमार सिंह सचिव तथा गोपाल प्रसाद कोषाध्यक्ष बने |

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