कुंदन श्रीवास्तव
विशेष संवाददाता
यह कहानी नहीं, बिहार क्रिकेट का एक्स-रे है—बस फर्क इतना है कि हड्डी कहीं और टूटी है, दर्द किसी और को हो रहा है। व्यंग्य भी कभी-कभी शर्माता है, क्योंकि बिहार क्रिकेट के हालात तो उससे भी बड़े कलाकार हैं। पीयूष कुमार सिंह की दास्तान उसी कला-प्रदर्शन का सबसे शांत मगर सबसे सटीक नमूना है—एक ऐसा खिलाड़ी जो मैदान पर रन बनाता रहा, और कमरे में बैठे लोगों के माथे पर शिकनें भी।
रणजी ट्रॉफी में उसके नाम 234 रन हैं। किसी को यह आंकड़ा छोटा लगे? बिल्कुल लगेगा—खासकर उन्हें, जिनके लिए खिलाड़ियों का करियर “परिचय-पत्र” से शुरू होता है और “किसका आदमी है?” पर खत्म। लेकिन 234 रन उस क्रिकेटर की क्षमता नहीं, चयनकर्ताओं की संवेदनहीनता के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट हैं।
असम के खिलाफ 103?
यह शतक स्कोरबोर्ड पर तो “100+” लिखा जाता है, लेकिन बिहार क्रिकेट के कैलकुलेटर में इसका फॉर्मूला ही नहीं है। बाकी बल्लेबाज़ गिरते रहे, वह अकेला खड़ा रहा—और चयनकर्ता? शायद उठकर चले गए होंगे, क्योंकि उन्हें “कहानी” सुननी थी, स्कोर नहीं।
लिस्ट-ए में टीम 235 पर ढह गई, पर पीयूष का 89 रन?
ये रन नहीं, “जिन्दा रहने” की घोषणा थी—लेकिन मैच में खेलकर अपने रन की भूख मिटाने के लिए पीयूष कुमार सिंह प्यासा रह गया, क्योंकि उसके सामने गेंदबाज़ नहीं, सिस्टम की दीवारें खड़ी थीं।
और महत्वपूर्ण यह कि मामला सिर्फ रणजी या लिस्ट-ए तक सीमित नहीं है।
इस वर्ष घरेलू क्रिकेट में पीयूष का प्रदर्शन लगातार इतना मजबूत रहा कि बीसीए मेंस ट्रॉफी में वह बल्लेबाज़ी चार्ट में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि प्रेसिडेंट कप में तीसरे नंबर पर।
कहीं भी मौका मिला—रन बरसाए।
हर टूर्नामेंट में चमका—लेकिन टीम प्रबंधन फिर भी अंधे।
क्यों?
क्योंकि बिहार क्रिकेट में खिलाड़ी का फॉर्म नहीं, उसके फॉर्म भरने वाले का नाम देखा जाता है।
वह किसका आदमी है?
कौन उसके पीछे है?
वह “हमारा बच्चा” है या किसी और का?
और सबसे बड़ा सवाल—उसके पास बैकडोर है या नहीं?
परफॉर्मेंस?
वह तो बस एक फुटनोट है, जिसे पढ़ने की ज़हमत किसी के पास नहीं।
ड्रेसिंग रूम में बैठा पीयूष शायद हर बार यही सोचता होगा—
“क्या गलती कर दी मैंने? स्कोर बना दिया? विकेट बचा लिया? ईमानदारी दिखाई? बस यही तो बड़ी गलती है!”
बिहार क्रिकेट का बंद कमरा आज भी उसी परंपरा का पालन कर रहा है।
बाहर से चाहे जितनी जोरदार दस्तक हो, दरवाज़ा तभी खुलेगा जब अंदर वालों को मन होगा।
और अभी तक?
पीयूष उनकी “विशलिस्ट” में भी नहीं है।
फिर भी, वह दस्तक दे रहा है—धीरे, शांत, बिना शोर किए।
क्योंकि उसे अपने खेल पर भरोसा है।
और टीम प्रबंधन को?
उन्हें अपने सिस्टम पर।
इतिहास जब भी बिहार क्रिकेट का लिखा जाएगा, उसमें एक अध्याय जरूर होगा—
“दस्तकें जो अनसुनी की गईं… लेकिन फिर भी रुकी नहीं।”
और उस अध्याय का नाम—
पीयूष कुमार सिंह।