
अरुण कुमार सिंह
पटना। क्रिकेटर, टीचर, रिसर्चर, ऑथर एंड एडमिनिस्ट्रेटर। पढ़ने के साथ साथ खेलने में भी अव्वल। लंबे अरसे तक राज्य के घरेलू क्रिकेट में खेले, एक जिला ही नहीं बल्कि पांच जिला का प्रतिनिधित्व किया । स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय, फिर राज्य टीम के हिस्सा बने। खेलने के लिए विदेश भी गये । ये सिर्फ न केवल खेल संघ के पदाधिकारी बने बल्कि शिक्षण संस्थानों के बड़े पद को भी संभाला यानी आल इन वन। सर्वगुण संपन्न इस दिग्गज हस्ती का नाम है सैयद मुमताज उद्दीन। वर्तमान समय में सैयद मुमताज उद्दीन बिहार विश्वविद्यालय में कमेस्ट्री पीजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। तो आइए जानते हैं इनके बारे में-
नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ के रहने वाली सैयद मुमताज उद्दीन के पिता स्व. बदुउद्दीन बिहार सरकार के एक्साइज डिपार्टमेंट में ऑफिसर के पद पर नौकरी करते थे। मुमताज उद्दीन के सर से पिता का साया बचपन में उठ गया। इस समय इनकी पिताजी की पोस्टिंग मुजफ्फरपुर में ही थी। पिता के देहांत के बाद इनका परिवार मुजफ्फरपुर का होकर रह गया। इसके बाद उन्हें उनके भाई सैयद निजामुद्दीन और मां पाला पोसा। उनके भाई सैयद निजामुद्दीन मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में लेक्चरर थे।





मुमताज उद्दीन की पढ़ाई और खेल दोनों में रूचि बराबर थी। वे अपने क्लास में हमेशा पहले स्थान पर रहते थे। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा 1973 में पहले दर्जे से पास की। इस परीक्षा में उनके स्कूल के कई विद्यार्थी फेल कर गए थे। पढ़ाई के साथ-साथ उनका क्रिकेट का सफर जारी था इसी कारण उनका चयन बिहार की स्कूल क्रिकेट टीम में हुआ पर मैट्रिक परीक्षा के कारण वे उसमें हिस्सा नहीं ले सके।
दायें हाथ के बल्लेबाज और कभी-कभी ऑफ ब्रेक गेंदबाजी करने वाले मुमताज उद्दीन ने इंटरमीडिएट में एलएस कॉलेज में नामांकन कराया और उसके बाद अपने कॉलेज की ओर 1973 से 1980 तक खेला। उन्होंने एलएस कॉलेज क्रिकेट टीम की कप्तानी भी की। ईस्ट जोन इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट में बिहार विश्वविद्यालय क्रिकेट टीम की ओर से खेलते हुए विश्व भारती विश्वविद्यालय के खिलाफ 118 रन की कप्तानी पारी खेली। इस टूर्नामेंट में बिहार विश्वविद्यालय की टीम क्वार्टरफाइनल स्टेज तक पहुंची। उन्होंने लगातार पांच साल तक बिहार विश्वविद्यालय की ओर से खेला और बिहार विश्वविद्यालय की ओर शतक लगाने वाले पहले खिलाड़ी बने।





बिहार में होने वाले अंतर जिला क्रिकेट टूर्नामेंट फॉर हेमन ट्रॉफी में उन्होंने 28 वर्षों तक विभिन्न जिलों की ओर से खेला। 1975-76 से लेकर सत्र 2002-03 तक उन्होंने मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर, समस्तीपुर और सीतामढ़ी जिला का प्रतिनिधित्व किया। कई सत्र में उन्होंने मुजफ्फरपुर जिला टीम का नेतृत्व भी किया। इस दौरान उन्होंने शतक और अर्धशतक की बौछार कर दी। इतने लंबे समय तक हेमन ट्रॉफी में हिस्सा लेना एक रिकॉर्ड ही है। संयुक्त बिहार में हेमन ट्रॉफी टूर्नामेंट के उच्च स्कोरर भी हैं मुमताज उद्दीन। इन मैचों में न केवल उनका बल्ला बोला बल्कि उपयोगी गेंदबाजी भी की।
वर्ष 1981-82 में वे हेमन ट्रॉफी क्रिकेट टूर्नामेंट में भागलपुर की ओर से खेला और सेमीफाइनल में रांची जैसी सशक्त टीम को मात देकर फाइनल में प्रवेश किया। इस मैच में उन्होंने 60 रन पहली पारी में बनाये। 1980 से 1990 के बीच उन्होंने रेस्ट ऑफ बिहार टीम की कप्तानी की। 1982-83 में बिहार रणजी टीम के सदस्य बने। यह पहला मौका था जब उत्तर बिहार का कोई खिलाड़ी बिहार रणजी टीम का सदस्य बना हो।






सैयद मुमताज उद्दीन खेल और पढ़ाई के बीच तालमेल हमेशा बना रहा। उन्होंने अपनी पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। स्कूल से लेकर एमएससी तक फस्र्ट क्लास फस्र्ट से पास होते चले गए। कमेस्ट्री से स्नातक की परीक्षा पास की। पीजी भी किया और 1989 में उन्होंने पीएचडी की डिग्री ले ली। अच्छी शिक्षा व डिग्री के कारण इन्हें कम उम्र 23 वर्ष में विश्वविद्यालय सेवा में नौकरी मिल गई और जिसके चलते यहां क्रिकेट प्रभावित हुआ।
वे वर्ष 1995 में सबा करीम के नेतृत्व में इंग्लैंड खेलने गई ईस्ट जोन टीम के भी सदस्य थे। इस टूर्नामेंट के दौरान सात मैच खेले गए जिसमें इनका प्रदर्शन शानदार रहा।


वे कहते हैं कि उस समय टीवी की सुविधा नहीं थी। इतने एज ग्रुप के मैच नहीं होते थे और मैं तो छोटे से शहर मुजफ्फरपुर से आता था। हमने क्रिकेट की बड़ी हस्तियों के बारे में समाचार पत्रों और खेल पत्रिकाओं में पढ़ कर जाना। क्रिकेट में आगे बढ़ा स्वयं की मेहनत और दृढ़ इच्छा शक्ति से।
सैयद मुमताज उद्दीन बहुत कम ही उम्र में अस्सिटेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, यूनिर्वसिटी प्रोफेसर बन गए। लगभग 19 विद्यार्थियों ने उनके अंदर में पीएचडी की डिग्री ली। कई रिसर्च पेपर छपे हैं। वर्ष 2017 में बेस्ट पीजी टीचर का अवार्ड इन्हें एसोसिएशन ऑफ कमेस्ट्री टीचर्स, मुंबई के द्वारा दिया गया। वे एलएन मिथिला विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
साथ ही क्रिकेट प्रशासक के रूप में इन्होंने काम किया। बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और बाद में कुछ दिनों के लिए अध्यक्ष भी बने।
(लेखक पटना जिला क्रिकेट संघ के संयुक्त सचिव हैं)