पटना, 28 दिसंबर। बिहार क्रिकेट संघ (बीसीए) के हुक्कमरानों की राजनीतिक पिच पर एक बार फिर रिवर्स स्विंग देखने को मिली है। जिस व्यक्ति से पूरे बिहार क्रिकेट जगत को न जाने कितनी बार “दूरी बनाए रखने” की नसीहत दी गई, वही व्यक्ति आज अचानक भरोसेमंद साथी बनकर कंधे से कंधा मिलाए खड़ा दिख रहा है। क्रिकेट की तरह यहां भी फार्म से ज्यादा ज़रूरत मायने रखती है—और ज़रूरत पड़ते ही पुराने सारे बयान नो-बॉल घोषित कर दिए गए।
यह कहना भी गलत होगा कि दोस्ती की पहल सिर्फ बीसीए की ओर से हुई। संबंधित महानुभाव भी मौके की नज़ाकत समझते हुए दो कदम आगे बढ़े। कल तक जो अपनों के बीच बीसीए के पुराने कर्ताधर्ताओं को लेकर खरी-खोटी सुना रहे थे, आज उसी मंडली में मुस्कुराते हुए नज़र आ रहे हैं। लगता है, इस नई-नवेली दोस्ती में दोनों पक्षों को रणनीतिक फायदा साफ दिखने लगा है।
विडंबना देखिए कि जिस व्यक्ति से पहले दूरी बनाने का फरमान जारी हुआ था, वही कभी बीसीए के वरीय कर्मचारी रह चुके हैं। यानी इतिहास से झगड़ा नहीं, बस सुविधा के हिसाब से उसकी व्याख्या बदलती रहती है।
दिलचस्प बात यह है कि यह दोस्ती न पटना में परवान चढ़ी, न दिल्ली की गलियारों में। इस ‘राजनीतिक संगम’ का साक्षात्कार हुआ गोवा के समुद्री तट पर—जहां लहरों के बीच बीसीए के दो वरीय, अडिग स्तंभ पदाधिकारी और संबंधित व्यक्ति मौज-मस्ती करते कैमरे में कैद हो गए। तस्वीर सोशल मीडिया पर क्या आई, चर्चाओं का तापमान सीधे हीट वेव में बदल गया।
और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। वही व्यक्ति बीसीए द्वारा विरोधियों को चारों खाने चित करने के लिए अधिवक्ताओं संग हुई मंथन बैठक में भी प्रमुखता से शामिल दिखे—जहां पदाधिकारियों के साथ कमेटी ऑफ मैनेजमेंट के सदस्य भी मौजूद थे। मतलब साफ है, दोस्ती अब सिर्फ तस्वीरों तक सीमित नहीं रही, रणनीति कक्ष तक पहुंच चुकी है।
इस दोस्ती की पहली आहट दरअसल विजय हजारे ट्रॉफी के लिए बिहार कैंप की संभावित खिलाड़ियों की सूची जारी होते ही सुनाई देने लगी थी। हालांकि अंतिम टीम सूची देखकर लगा कि शायद बात आगे नहीं बढ़ी। मगर गोवा वाली तस्वीर ने सारे संदेहों पर फुल स्टॉप लगा दिया।
आखिरकार, यह राजनीति है—यहां कौन कब, किस पाले में बल्लेबाजी करने लगे, इसका अंदाज़ा लगाना उतना ही मुश्किल है जितना आखिरी ओवर में गेंद की दिशा।