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बिहार शतरंज की तीसरी पीढ़ी की कहानी-कुछ आँखों देखी और कुछ सुनी जुबानी

अरविंद कुमार सिन्हा, फ़िडे मास्टर
पटना। गत भाग में वर्णित उपलबद्धियों के बाद 1987 का नया साल भी बिहार शतरंज के लिए नई खुशियों के गुबार लाया जब पटना के पप्पू रमानी राष्ट्रीय जूनियर के उपविजेता बनकर बिहार की कलगी पर नया नगीना जड़ दिया| पप्पू रमानी ने यह उपलबद्धि विश्वनाथन आनंद को ड्रा पर रोक कर प्राप्त की थी | महासंघ के बदले नियमों  के अनुसार अब उपविजेता को एशियन जूनियर में जाना था | प्रभाकर झा ने बिहार की ओर से पप्पू के प्रशिक्षक के रूप में अरविंद की अनुशंसा की, जो पप्पू रमानी द्वारा भेजे गए नाम पर भारी पड़ी और अरविंद,पप्पू रमानी के साथ दुबई गए | महासंघ के सचिव मैनुअल एरन ने एशियन में प्रशिक्षक नियुक्त करते हुये अपने पत्र में फ़िडे मास्टर अरविंद सिन्हा को दुबई में आयोजित युनियन बैंक ऑफ मिड्डल ईस्ट अंतरराष्ट्रीय ओपन प्रतियोगिता में अंतर्राष्ट्रीय मास्टर रवि कुमार तथा टी एन परमेश्वरन के साथ भारत की ओर से खेलेने की अनुशंसा कर दी थी|अरविंद को उस प्रतियोगता में 5वां पुरस्कार मिला | पप्पू रमानी, जो बिसात पर कड़ी मेहनत कर बाजी अपने पक्ष में करने की कला जानते थे , अपनी एक जीती बाजी ड्रा कर बैठे जिसके कारण उनके हाथों से दूसरा स्थान खिसक गया और उन्हें चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा जो प्रमोद सिंह की एशियन में पूर्व की उपलबद्धियों के समतुल्य था |

1988का साल भी बिहार शतरंज की उपलब्धियों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा जब राष्ट्रीय जूनियर प्रतियोगिता जो पोल्लाची में हुई थी,बेगूसराय के मनीषी कृष्ण ने विजेताका खिताब जीता |बिहार के लिए यह तीसरा अवसर था जब मनीषी ने ठोस खेल का प्रदर्शन कर राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का परचम फिर लहरादिया|बहरहाल, राज्य संघ द्वारा ,1989 के एशियन जूनियर में मनीषी कृष्ण के साथ प्रशिक्षक के रूप में बिहार क्रीडा परिषद के तत्कालीन सचिव का नाम भेजा गया| किसी सरकारी अधिकारी का प्रशिक्षक के रूप में अनुशंसा अजीबोगरीब तो थी ही, राज्य संघ के पदासीन गुट की मंशा भी उजागर करती थी | इस बात की जानकारी मिलते ही मनीषी कृष्ण ने आपत्ति जताते हुये महासंघ को पत्र लिखा और अपने प्रशिक्षक अरविंद को भेजने का निवेदन किया जिनके पास मनीषी बेगुसराय से रविवार के दिन शतरंज का प्रशिक्षण लेने पटना आते थे | 1989 का महासंघ का चुनाव भी सर पर था,अत: किसी जोखिम और रार को टालते हुये सचिव मैनुअल एरन ने अरविंद और मनीषी को फोन कर कोशी के नाम पर राजी कर मनीषी की साथ दुबई भेजा | मनीषी को उस एशियन जूनियर में चौथा स्थान मिला |

तब तक कोशी भी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की सेवा छोड टिस्को, जमशेदपुर में नियुक्त हो चुके थे और वे 1993 में अंतर्राष्ट्रीय मास्टर बने तथा 1996 में टिस्को छोड़ दिया |सिंहभूम जिला में तब नरेश अग्रवाल, आर एस प्रसाद, के एम प्रसाद, काशीनाथ खिरवाल, जैसे शतरंज प्रेमी मौजूद थे | बाद में बी एस सोहल, बी टी राव, विश्वनाथ अग्रवाल, वेणुगोपाल, जयंत भुईयां, ए के बोस आदि को लेकर एक नई टीम बनी|1987 में टाटा स्टील खुली शतरंज प्रतियोगिता का आयोजनहुआ जिसमें देश के लगभग सभी नामी खिलाड़ी खेले थे |1990 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के ‘टायोक’नाम से जमशेदपुर में भव्य आयोजन हुआ|इसकी अगली कड़ी अपने बृहदतम रूप में 1993 में आयोजित हुई जिसमें लगभग 650 खिलाड़ियों ने भाग लिया था| दो पाली में मैचहुये थे जो शायद रिर्कोर्ड ही है |टाटा चेस सेंटर बना, जहां युवा खिलाड़ियों के लिए एक सप्ताह का आवासीय प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाते |आयु वर्ग के खिलाड़ियों के प्रशिक्षण वर्ग में अरविंद सिन्हा को भी कई बार बुलाया गया |मुख्यत: जयंत भुईयां की देखरेख  में चले ऐसे प्रयास फलीभूत होने लगे और पूर्वी सिंहभूम जिला में युवा प्रतिभाओं की बाढ़ आ गई |

तभी बंगाल से दिबयेन्दु बरूआ 1985 में टिस्को सेवा में कोलकाता से जमशेदपुर आए| बरूआ,  आनंद के बाद भारत के दूसरे ग्रैंडमास्टर हैं जिसका खिताब उन्हें 1991 में मिला | वैसे तो बरूआ को अर्जुन पुरस्कार 1986 में मिला पर वह 1983 की उपलबद्धियों के लिएथा|विश्व प्रतियोगिताओं में 5 बार भारत का प्रतिनिधित्वतथा स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक प्राप्त करने का गौरव उन्हें प्राप्त है |

उसी प्रकार नीरज कुमार मिश्रा भी 1990 में बंगाल से टिस्को सेवा में आए और 1991 में अंतर्राष्ट्रीय मास्टर का खिताब मिला और भारतीय सीनियर टीम में  1992 और 2001 में चुने गए| इन सबों के साथ मिलने से सिंहभूम जिला के साथ-साथ बिहार शतरंज अनायास ही नई ऊंचाईयां छूने लगा था |बाद में 2002 मे स्वैच्छिक सेवानिवृती ले ली |

शायद हममें से बहुतों को पता न  हो, जमशेद्पुर की दोलन चम्पा बोस राष्ट्रीय महिला अंडर 14प्रतियोगिताएं लगातार 1989 तथा 1990 में विजेता बन कर विश्व कैडेट,जो क्रमश: प्योरटोरिको तथा विन्स्कोंसिम (अमेरिका) में भारत की ओर से खेली| वहीं अंडर-16 आयुवर्ग की 1990 तथा 1992 की इस विजेता ने विश्व प्रतियोगिता जो क्रमश: सिंगापूर तथा जर्मनी में हुईं थीं,में खेला है |1991 में विश्व अंडर 18,ब्राज़ील में भारत का प्रतिनिधित्व किया|1991 में राष्ट्रीय अंडर 17 की विजेता होने का गौरव तो है ही,1991 में  राष्ट्रीय महिला जूनियर में तीसरा स्थान पाते हुये कालीकट में आयोजित विश्व जूनियर में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया| इसके अतिरिक्त सीनियरराष्ट्रीय महिला ए प्रतियोगिता खेलने का गौरव भी उनके पास है | आपको जानकार दुख होगा कि इस अत्यंत प्रतिभाशाली खिलाड़ी को सिवाय खेल मंत्री,बिहार सरकार द्वारा सम्मानित होने के, और कुछ नहीं मिला|बिहार शतरंज, पूर्वी सिंहभूम जिला, टाटा कंपनी,बिहार अथवा झारखण्ड सरकार, उसे नौकरी देने वा दिला पाने में विफल रहीं |अपने पिता ए के बोस के असामयिक निधन होने और बड़ी संतान होने के कारण दोलन को खेल छोडना पड़ा|संप्रति,कोलकाता के एक स्कूल में शतरंज प्रशिक्षक की नौकरी कर रहीं हैं |

राष्ट्रीय अंडर 12,1990 के बालक वर्ग के विजेता राधा कृष्ण कामथ ने विश्व कैडेट जो प्योरटोरिको (यू एस ए ) में आयोजित हुई थी भारत के लिए कांस्य पदक जीत कर देश का नाम बढ़ाया | कामथ के पिता टाटा कंपनी  के उच्चाधिकारी थे |जहां भूदेव त्रिपाठी को एशियन सिटिज, दुबई में पूर्वी सिंहभूम जिला की ओर से खेलते हुये तीसरी बिसात का बोर्ड प्राईज़ मिला वहींबालिका वर्ग में मालविका सिंह ने 1992 में राष्ट्रीय अंडर 8 (त्रिवेन्द्रम) और 1994 की राष्ट्रीय अंडर 12 (कालीकट) की उपविजेता बनी| 1993 में राष्ट्रीय अंडर 10 (पालकाड) की विजेता बनकर स्लोवाकिया में भारत का प्रतिनिधित्व किया|

आईए अब चलें बिहार शतरंज की ओर | वैसे तो राष्ट्रीय अंडर 25 प्रतियोगिता का आयोजन तो दिसंबर 1988 में हो गया परंतु कहते हैं कि आयोजन समिति गठन के समय से ही कुछ वरीय खिलाड़ी जो शुरू से ही प्रभाकर झा के साथ थे,अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे थे | शायद कोई शातिर दिमाग मतभेद को मन भेद बनाते हुये अपनी जुगत में जुटा था |बताते हैं कि तब सचिव प्रभाकर झा और कोषाध्यक्ष अजय नारायण शर्मा के बीच भी परस्पर विश्वास और मतैक्य मेंदरार  देखी जाती थी |वरीय खिलाड़ियों से सत्ता पक्ष की दूरी तब और बढ़ गई जब जिला संघों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापण देकर चुनाव कराने को कहा गया | सो क्रिकेट से जुड़े लोगों की तैयार टीम में से कुछ शतरंज संघ के सचिव बना दिये गए | राँची  के जयकुमार सिन्हा जो रांची में क्रिकेट के प्रशिक्षक थे, अब शतरंज के सचिव बन गए थे |जयकुमार सिन्हा ने 1990 में राज्य प्रतियोगिता वाकई बहुत अच्छे ढंग से कराई और योग्य आयोजक के रूप में पहचान बनाई | आज भी वे रांची के सचिव हैं| कोशी विजेता बने पर संघ के चुनाव में वही हुआ जो अपेक्षित था|नए जिला संघ का वोट जो था| पर कोया को सारे घटनाक्रम के पल-पल की जानकारी थी |

1989 के भारतीय शतरंज महासंघ के चुनाव में प्रभाकर झा तथा ए आर खान दोनों ने क्रमश: उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव पद के लिए पर्चा भरा| मैनुअल एरन की ओर से पी टी उमरकोया सचिव पद के उम्मीदवार थे|झा जी  और खान साहब दोनों महासंघ की उच्चस्तरीय राजनीतिकी दिशा-दशा भाँप नहीं पाये और विरोधी गुट के साथ हो लिए,जिसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया और वे दोनों हार गए|कोया चुनाव में जीत तो गए पर बिहार के खिलाफ वोट की बातभूले नहीं|प्राप्त शिकायतों पर संज्ञान लेते हुये बिहार के पुराने विवाद की फाईल खोल दी| दोनों पक्षों को जमशेद्पुर बुलाया गया,फिर से कागजात मांगे गए| पर कोया ने मामले को लटकाये रखा, क्योंकि आर एन सिन्हा वाला दूसरा पक्ष भी कोई कम नहीं था |पर प्रभाकर झा को संदेश तो मिल ही गया था | खिन्न झा जी 1991 में खान साहब को चुपके से सत्ता सौंप कर हट गएफिर भी,बिहार पर कोया की तरफ से संशय बना रहा|

1992 में कोलकाता के गुडरिक अंतर्राष्ट्रीय ओपन शतरंज 1992 में आनंद खेलने वाले थे|टाइम्स ऑफ इंडिया,पटना की रिपोर्टिंग करने नवीन उपाध्याय हवाई जहाज से गए और अपने रेल टिकट पर अरविंद को भी ले गए | नवीन से कोया की अच्छी मित्रता थी सो दोनों ने मिलकर बिहार शतरंज में बदलाव की बात की,पर कोया ने पहले राष्ट्रीय ए प्रतियोगिता पटना में कराने की शर्त रख दी|नवीन हिचकिचाए जरूर पर अरविंद के उत्साह बढ़ाने पर हामी भर दी और तत्काल कोया ने उन्हें संयोजक बनाते हुये अधिकार-पत्र भी दे दिया |नवीन उपाध्याय ने पटना  के खिलाड़ियों और अपने शुभेच्छुओं के साथ आयोजन के लिए जुटे |जिला विकास पदाधिकारी त्रिपुरारि शरण, आई ए एस की अध्यक्षता में आयोजन समिति बनी, सीनियर एस पी अमरीक सिंह निंबरान,अमिताभ वर्मा आई ए एस, सिटी एस पी अजय कुमार जैसे स्थानीय प्रशासन से जुड़े अधिकारियों को साथ ले बनी समिति के आयोजन सचिवबने पी टी उमरकोया, संयुक्त सचिव अरविंद सिन्हा,कोषाध्यक्ष आनंद मोहन वर्मा और साथ में थे संजीव कुमार , वर्गीज़ कोशी, वीरेंद्र कुमार, कृष्ण भूषण पद्मदेव, सुमन कुमार सिंह, स्वपन मिश्रा सहित मुकेश राय की पूरी टीम|उदघाटन में मुख्यमंत्री लालू जी का आना,आयोजन में चार चाँद लगा गया |त्रिपुरारि शरण ने अपने घर पर अतिथि खिलाड़ियों को पार्टी दी, जिसमें कोया भी आए | उसी प्रकार प्रेम कुमार ने भी सभी खिलाड़ियों और आयोजकों को घर पर पार्टी दी| वहीं पर खान साहब से कोया की मुलाक़ात हुई, पर बिहार का मामला अधर में ही रहा |कोया द्वारा बिना बिहार को बताए नेशनल कराना,खान साहब को भीतर से असहज कर गया था |

1993 के टाटा टूर्नामेंट में उपस्थित खान साहब मौका ताड़ कर कोया के साथ एयरपोर्ट तक चले गए|कहते हैं कि उसी दौरान खान साहब ने कोया को सॉरी कहते हुये मना लिया था|1993 के शतरंज महासंघ के चुनाव के ठीक पहले कोया ने बिहार शतरंज की मान्यता बहालकर दी और इस प्रकार उमरकोया दोबारा महासंघ के सचिव बने और बिहार शतरंज में,ए आर खान |

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