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बिहार शतरंज की तीसरी पीढ़ी की कहानी, कुछ आँखों देखी और कुछ सुनी जुबानी

अरविंद कुमार सिन्हा, फ़िडे मास्टर
पटना। गत चर्चा में हमने यह जाना था कि  किस प्रकार 1985 में बिहार शतरंज संघ को बदले नाम ऑल बिहार शतरंज संघ के साथ मान्यता मिली और प्रभाकर झा सचिव,प्रो अमरनाथ सिंह अध्यक्ष तथा अजय नारायण शर्मा कोषाध्यक्ष बने|यहाँ पर सुधार कराते हुये हम जानें कि अमर नाथ सिंह अध्यक्ष बने तो जरूर पर ज्योति कुमार सिन्हा,आई जी पुलिस के बाद |वस्तुत: अध्यक्ष पद मान्यता के बाद भी रिक्त ही रहा और बाद में ज्योति कुमार सिन्हा को अध्यक्ष बनाया गया |वैसे नई कार्यकारिणी ज्योति बाबू से कोई उल्लेखनीय मदद ले सकने में विफल रही या संभव है उन्होनें भी अपनी कार्यव्यस्तता के कारण कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई | बाद में प्रो अमरनाथ सिंह के अध्यक्ष बनाने के बाद 1988 में राष्ट्रीय अंडर 25 प्रतियोगिता का आयोजन बोरिंग रोड स्थित शक्ति कॉम्प्लेक्स में किया गया जिसमें शतरंज महासंघ के सचिव गालिब साहब भी पधारे थे |1975 में पी एन शर्मा साहब के नेतृत्व में आयोजित राष्ट्रीय बी और राष्ट्रीय ए के बाद यदि इसे भी मील का पत्थर माना जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी |

बहरहाल,इसके पहले कि हम आगे बढ़ें ,हम थोड़ा सा पीछे झाँकते हुये उन उपलब्धियों को देखते चलें जो निजी तौर पर उतनी महत्वपूर्ण न दिखें पर जिनकी भूमिका ऐतिहासिक महत्व की हो| बिहार के लिए राष्ट्रीय जूनियर 1980 और 1981 का खिताब लेना कतई आसान न था क्योंकि दिबयेन्दु बरूआ प्रतियोगिता जीतने के प्रबलतम दावेदार थे| उस इतिहास सृजन में बिहार के जिन दो युवा प्रतिभाओं की भूमिका रही है वे हैं पटना के सुशील कुमार सिन्हा और सुमन कुमार सिंह |1980 की राष्ट्रीय जूनियर में बरूआ को आधे अंक पर रोक कर उनके विजेता पद की दावेदारी को कुंद कर दिया था, बिहार के सुशील कुमार सिन्हा ने |जबकि सुमन कुमार सिंह ने 1981 की राष्ट्रीय जूनियर में दिबयेन्दु बरूआ को हरा कर प्रमोद सिंह से एक अंक पीछे धकेलने में कामयाब रहे थे| सुमन केसिसिलियन नैजडोर्फ की उस रोमांचक बाजी में मिली जीत ने शायद प्रमोद सिंह के दोबारा विजेता बनने की भूमिका पहले ही लिख दी थी| वैसे भी सुमन सिंह 1983 आते-आते राष्ट्रीय बी प्रतियोगिता में कई नामचीन खिलाड़ियों को परास्त कर या बराबरी पर रोक कर धाक जमा चुके थे| उसी प्रकार पटना के किशोर कुमार और बोकारो के शांतनु लाहिड़ी ने राष्ट्रीय सब जूनियर, सिकंदराबाद  82-83 में क्रमश: 6ठा और 7वां स्थान प्राप्त कर बिहार शतरंज का मस्तक ऊंचा किया था |किशोर ने बिहार का प्रतिनिधिव राष्ट्रीय बी में भी 1989 तक किया पर बाद में पारिवारिक जिम्मेवारियों ने उन्हें आगे खेलने की अनुमति नहीं दी |

उसी प्रकार शांतनु के छोटे भाई अतनु लाहिड़ी 1983 में धनबाद में आयोजित बिहार जूनियर विजेता बने और बाद में फिर 1987 में भी यह खिताब जीता| दोनों भाईयों ने राष्ट्रीय बी प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया|

[बाद में वे दोनों बंगाल चले गए जहां अतनु अंतर्राष्ट्रीय मास्टर बने| बंगाल में सचिव, भारतीय महासंघ के संयुक्त सचिव तथा संप्रति विश्व शतरंज महासंघ में चेस इन एजुकेशन कमीशन के कॉन्टिनेन्टल प्रतिनिधि हैं |बड़े भाई शांतनु इन दिनों बंगाल शतरंज संघ के अध्यक्ष हैं ]

बहरहाल, मान्यता बहाल होने के बाद 1985 की राज्य प्रतियोगिता धूम धाम से आयोजित हुई जहां मो जमाल अख्तर (सचिव) ,सुल्तान अहमद , जीतू सिंह और मो जावेद वैशाली के नामी खिलाड़ियों में शामिल थे |बाद के दिनों में रश्मि कुमारी ने आयु वर्ग में बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया| उसी प्रतियोगिता में राज्य विजेता बने पी के सिंह के साथ पटना के संजीव कुमार ने भी टीम में जगह बनाई| वहीं पहली बार खेल रहे बेगूसराय के 14 वर्षीय किशोर मनीषी कृष्ण ने कई धुरंधरों के दाँत खट्टे कर संभावित शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल होने के संकेत दे दिये थे |

आपको याद हो कि आयोजन के क्षेत्र में उन दिनों लक्खीसराय का नाम नक्षत्र बन चमका था| वैसे तो वहाँ के सचिव अनिल सिंह, जो स्वयं भी अच्छे खिलाड़ी थे, को लखीसराय की मान्यता 1979 में ही मिल गई थी और उन्होने पटना के कुछ नामी खिलाड़ियों को बुला कर अपने यहाँ ग्रामीण माहौल में एक स्मारक प्रतियोगिता करा कर अपनी छाप छोड़ दी थी | बाद के वर्षों में अध्यक्ष के रूप में डा प्रवीण कुमार के सहयोग से 1986, 1988 तथा काफी बाद तक भी राज्य प्रतियोगिताएं कराईंऔर सक्रिय रहे |कर्मठ अनिल सिंह सदा सत्ता पक्ष के साथ रहते हुए बिहार शतरंज का एक योग्य, भरोसेमंद और संकटमोचक आयोजक के रूप में जाने गए |

1985 की राष्ट्रीय बी प्रतियोगिता में अरविंद सिन्हा ने राष्ट्रीय ए प्रतियोगिता के लिए तीसरी बार क्वालिफ़ाई कर बिहार का गौरव बढ़ाया| यह प्रतियोगिता आई आई टी, मुंबई में आयोजित की गई थी | वहीं अखिल भारतीय शतरंज महासंघ का वह ऐतिहासिक चुनाव भी हुआ था जिसमें बी वर्मा दूसरी बार महासंघ के अध्यक्ष पद के लिए लड़े और अपने प्रतिद्वंद्वी डा एन महालिंगम से काफी ज्यादा वोट पाने के बावजूद उन्हें पद छोड़ना पड़ा |महासंघ के संविधान में अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष पद पर दोबारा आसीन रहने लिए दो- तिहाई का बहुमत अनिवार्य था | इस प्रकार मैनुअल एरन सचिव और महालिंगम अध्यक्ष चुने गए |

1983 में बिहार शतरंज में उपजे विवाद के बाद पी के सिंह लगातार बिहार सरकार से निधि लेकर लॉयड्स बैंक प्रतियोगिताओं में खेलने लंदन जाते रहे थे | इस बार अरविंद सिन्हा 1986 में आयोजित राष्ट्रीय ए प्रतियोगिता खेलने के उपरांत,जिसमें उनकी विश्वनाथन आनंद पर मिली जीत को देश भर के समाचारपत्रों में प्रमुखता मिली थी,अबकी बार अरविंद ने भीलंदन जाकर खेला चाहा | अवसर भी अच्छा था क्योंकि इस बार कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता भी लंदन में ही होनी थी|सचिव प्रभाकर झा के साथ रवि मेहता (बिहार ओलंपिक संघ) और खेल मंत्री अर्जुन विक्रम शाह से मिले | रवि मेहता जो बिहार खेल परिषद के उपाध्यक्ष थे तथा खेल मंत्री,दोनों ने हाथों हाथ लिया और तत्कालीन खेल सचिव नवीन कुमार ने अपने हांथों  से अरविंद को 15000/- हजार रुपये अनुदान का चेक दिया जिसे याद किया जाना चाहिए |[ एकाध सप्ताह बाद ही यही अनुदान राशि नैनू सिंह और पी के सिंह तथा मैनेजर के रूप में पी एन शर्मा साहब लेने में सफल रहे और वे सभी एक साथ लंदन गए ]

अरविंद ने कॉमनवेल्थ प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 9 में से 6 अंक लेकर सातवाँ स्थान और ‘ फ़िडे मास्टर’ का खिताब पाया जो बिहार के लिए पहली उपलबद्धि थी |पर उसे अंतर्राष्ट्रीय मास्टर नॉर्म तकनीकी कारणों से नहीं मिल सका क्योंकि 1986 के पहले तक किसी चक्र में चेस कंप्यूटर से जीतने पर नॉर्म के लिए गिनती होती थी और बाद में भी होती रही पर 1986 साल के लिए फ़िडे ने इसे हटा दिया था |

प्रसंगवश, लंदन से लौटते ही स्थानीय अङ्ग्रेज़ी दैनिक दि हिंदुस्तान टाईम्स के खेल संपादक शशि शर्मा ने शतरंज स्तम्भ लेखन का प्रस्ताव दिलवाया |प्रभाकर झा का प्रोत्साहन तो था ही और पहली बार अखबार में साप्ताहिक स्तम्भ लिखने की झिझक को झा जी ने प्रथम स्तम्भ की भूमिका का भाग लिख कर दूर कर दी | यह स्तम्भ लेखन करीब दो-ढाई वर्षों तक चला जिससे खिलाड़ियों को लाभ तो मिला ही होगा अतएव इसे चर्चा में शामिल किया जा रहा है|

उन दिनों प्रभाकर झा ने कुमुद रंजन झा, मंत्री को भी शतरंज से जोड़ लिया था जिन्होंने मगध महिला कॉलेज में आयोजित राज्य महिला शतरंज की विजेताओं को पुरस्कृत किया| सुंदर आयोजन,व्यवस्था और खिलाड़ियों की संख्या के मापदण्ड पर खरी उस राज्य महिला शतरंज बेहतरीन आयोजन माना जाता है | कुमुद  रंजन झा की अनुशंसा पर बिहार युवा पत्रकार संघ न द्वारा सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में अरविंद का नाम ‘बिहार श्री’ के लिए प्रस्तावित हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने अरविंद को ‘ बिहार श्री’ की उपाधि से विभूषित किया |

तब तक बिहार के अन्य जिले भी शतरंज की मुख्य धारा में आते जा रहे थे |बिहार शतरंज संघ की स्थापना के पूर्व से ही मुजफ्फरपुर, शतरंज का प्रमुख गढ़ रहा था  जहां रवीन्द्र गुप्ता ‘किंजल्क’, अवधेश कुमार सिन्हा ( जिनकी चर्चा पहली पीढ़ी की चर्चा में हो चुकी है ), एस एन वाही (राज्य संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक), मिथिलेश कुमार सिन्हा,उभय रंजन जैसे खिलाड़ियों के सहयोग से जिला संघ बनाने का विधिवत प्रयास राजीव कुमार सिन्हा ने 1985 में किया | पटना के वशीम अख्तर जो बिहार कार्यकारिणी के सदस्य थे और मुजफ्फरपुर में नियुक्त थे , के सहयोग से 1986 में राज्य शतरंज से मान्यता मिली |जिला संघ ने बाद के दिनों मेअखिल भारतीय खुली शतरंज प्रतियोगिता 1994 के अतिरिक्त राष्ट्रीय रेपिड (1995); राष्ट्रीय अंडर 25 ( 1996 ),खुली रेटिंग 1997 तथा राष्ट्रीय ए प्रतियोगिताएं कराईं | इतने आयोजनों से वहाँ नामचीन खिलाड़ियों की बड़ी खेप निकली जिनमें संजीव कुमार,  जी एन अभय , सुजीत कुमार सिन्हा, मनीष कुमार, आर के पॉल, कुमार गौरव के नाम प्रमुख है जिन्होंने न सिर्फ बिहार का प्रतिनिधित्व किया बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान भी बनाई | संजीव कुमार को राष्ट्रीय बी प्रतियोगिताओं में देश के नामी खिलाड़ियों पर जीत या बराबरी करने का गौरव प्राप्त है | संजीव ने एक बार राष्ट्रीय अंडर 25 में 5 वां स्थान कर स्टैंड बाई में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर भी मिला था पर वे जा नहीं सके | कहना न होगा कि बड़ी तेजी से मुजफ्फरपुर वास्तविक अर्थों में पटना से आगे निकल कर बिहार शतरंज का प्रमुख केंद्र बन बैठा था |

1985 में ही बेगुसराय, जहां अरबिन्द प्रसाद सिंह ,अतुल बिहारी शरण, महावीर अग्रवाल,अशोक कुमार, धर्मवीर अग्रवाल, रवि कुमार सिन्हा ( सभी पटना विश्विद्यालय ), दीपक कुमार सिन्हा जैसे खिलाड़ियों ने सिक्का जमा रखा था,अरबिन्द सिंह जिला संघ का गठन कर सचिव बने और 1987 में बेगुसराय को राज्य प्रतियोगिता आयोजित की |बरौनी रिफाइनरी टाउंनशिप में आयोजित वह प्रतियोगिता वाई पी श्रीवास्तव के लिए यादगार बन गई जहां उनहोने पहली बार राज्य विजेता का खिताब जीता | मुजफ्फरपुर से आए संजीव कुमार,बेगुसराय के मनीषी कृष्ण, जमशेदपुर के भूदेव त्रिपाठी,जैसी युवा प्रतिभाओं का उदय उसी प्रतियोगिता में माना जाता है|
बिहार शतरंज की तीसरी पीढ़ी की कहानी का यह पहला पार्ट है। दूसरा पार्ट कल पढ़ें।

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