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पटना का यह दिग्गज हरफनमौला क्रिकेटर ‘लंकेश’ के नाम से हैं मशहूर, जानें क्यों

मधु शर्मा
पटना। बात उन दिनों की है जब दूरदर्शन चैनल पर पहली बार टीवी सीरियल रामायण का प्रसारण प्रारंभ हुआ था। लोग पहली बार रामायण के हर करेक्टर से रू-ब-रू हो रहे थे। लोगों के दिलो दिमाग पर हर करेक्टर की छवि जीवंत हुई थी, कैसे कौन क्या कर रहा है। ‘लंकेश’ के नाम से मशहूर लंकापति रावण कैसे अपनी शक्ति की बदौलत साम्राज्य स्थापित कर रहें है। ठीक उसी काल में पटना के इस क्रिकेटर का क्रिकेट में साम्राज्य स्थापित हो रहा था। पिच पर जाते ही विपक्षी खेमे में त्राहिमाम मच जाता था। न केवल बैटिंग बल्कि अपनी गेंदबाजी से विपक्षियों के छक्के छुड़ाता था। वह दिग्गज क्रिकेटर हैं बिहार स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के क्रिकेट खिलाडी सुनील कुमार सिंह जो की क्रिकेट के दुनिया में सुनील सिंह के नाम से जादा प्रसिद्ध थे। तो आइए जानते हैं उनके बारे में-

सुनील कुमार सिंह का जन्म मुंगेर में 16 सितंबर, 1959 को हुआ था, ये छपरा (सारण) के मूल निवासी है। उनका परिवार 1962 से पटना में रह रहा है। उन्होंने स्कूली शिक्षा की शुरुआत संत जेवियर स्कूल से की। इसके बाद वे संत माइकल हाईस्कूल चले गए। यूँ तो सुनील सिंह बचपन में अपने मोहल्ला के दोस्तों के साथ क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, शतरंज, बैडमिंटन एवं टेबल टेनिस कई गल्ली मोहल्लों में खेला करते थे। परंतु क्रिकेट और शतरंज में उनकी विशेष रूचि थी।

स्कूली शिक्षा के दौरान ही बिहार स्पोट्र्स काउंसिल (अब बिहार राज्य खेल परिषद्) ने टैलेंट सर्च प्रोग्राम शुरू किया था। इसके अंतर्गत क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी खेलों के बच्चों को चुनकर खास केंद्रों पर अभ्यास कराया जाता था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत जिस स्कूल को केंद्र बनाया जाता था उसी स्कूल में बच्चे को नामांकन कराना होता था। सुनील सिंह इस टैलेंट सर्च स्कीम के अंतर्गत चुन लिये गए (बिहार स्कूल बॉयज) और इन्होंने अपना नामांकन पटना हाईस्कूल में करा लिया। इसी हाईस्कूल को क्रिकेट का ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया था। इस सेंटर पर स्व. आईएस ठाकुर ने सुनील सिंह के क्रिकेट को तराशा। मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने यहां से पास की।


इसी दौरान इनके बड़े भाई और अन्य कई सीनियर प्लेयरों ने मिल कर एक क्रिकेट टीम बनाई और नाम रखा एसके पुरी क्रिकेट क्लब। वर्ष 1974 में टीम जूनियर डिवीजन क्रिकेट लीग के लिए रजिस्टर्ड हुई। इस टीम में उनके बड़े भाई समेत कई अन्य बेहतर खिलाड़ी थे। सुनील सिंह को भी टीम में जगह मिली। टीम ने शानदार प्रदर्शन किया और इस साल चैंपियन हो गई और सीनियर डिवीजन के लिए क्वालिफाई कर लिया। फाइनल मैच में सुनील सिंह ने पांच रन देकर पांच विकेट चटकाये।

सीनियर डिवीजन क्रिकेट लीग के पहले मैच में उनकी टीम का मुकाबला गौतम चटर्जी की टीम सायंस कॉलेज से हुआ। गौतम चटर्जी उस जमाने के खतरनाक तेज गेंदबाज थे। बहुत सारे खिलाड़ी गौतम चटर्जी की गेंदों का सामना करना नहीं चाहते थे पर सुनील सिंह ने इस मैच में शानदार खेल दिखाया और 75 रन बनाये। इस परफॉरमेंस ने उनका आत्मबल बढ़ाया और आगे के मैचों में भी उनका शानदार प्रदर्शन जारी रहा।

अगले सीजन में सुनील सिंह ने अपना टीम बदल लिया और वे अधिकारी इलेवन की ओर से खेले गए। इसी साल इस टीम में टीजीएस लांबा भी आये थे। वे कहते हैं कि सभी लोग जानते हैं कि अधिकारी जी उस समय इंस्टीच्यूट ऑफ क्रिकेट लर्निंग थे। मैंने भी उनसे काफी सीखा जो भविष्य में मेरे काम आया।


एक साथ खेलते हुए सुनील सिंह की टॉनी लांबा से गहरी दोस्ती हो गई जो अबतक निभती आ रही है। फरवरी, 1976 में सुनील सिंह का चयन अखिल भारतीय अंतर विद्यालय द्वारा आयोजित कर्नल सीके नायडू प्रतियोगिता में भाग लेने वाली बिहार टीम में हुआ पर माताजी की तबीयत खराब होने के कारण वे नहीं जा सके। सत्र 1976-77 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन द्वारा कूच बिहार ट्रॉफी में भाग लेने वाली बिहार टीम का सेलेक्शन ट्रायल जमशेदपुर में आयोजित किया गया था पर उनका चयन नहीं हुआ है। वे चयन से निराश नहीं थे। वे खुश थे क्योंकि उनके प्रिय मित्र टॉनी लांबा का चयन हो गया था। इसी सत्र में उनके क्रिकेट कैरियर में उछाल आया। जमशेदपुर और पटना के बीच हेमन ट्रॉफी का फाइनल मैच खेला गया। इसमें उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने पहली इनिंग में अपनी टीम की ओर उच्चतम स्कोर बनाया। मैच जमशेदपुर ने जीता।


वे कहते हैं कि कि इस मैच में उन्हें बिहार के कई दिग्गज खिलाड़ियों स्व. प्रतीक नारायण, अजय नारायण शर्मा और गौतम चटर्जी के साथ खेलने का सौभाग्य मिला। इन सबों ने हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया।


मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद सुनील सिंह ने वाणिज्य महाविद्यालय में नामांकन कराया। यहां भी उनके साथ टॉनी लांबा थे। इस कॉलेज में श्रवण गोप, देवकीनंदन दास, मुकेश राय, सुब्रतो कांति दास, राजीव रतन सिंह खिलाड़ी थे। साथ ही इन खिलाड़ियों के मेंटर, गुरु और लीडर प्रेम कुमार इसी कॉलेज में थे। वाणिज्य महाविद्यालय की ओर से खेलते हुए 1977-78 से लेकर 1979-80 तक पटना एवं पटना से बहार आयोजित सभी टूर्नामेंट समेत कई जगहों पर टूर्नामेंट खेले और ट्रॉफी जीते।

इसी दौरान पटना कॉलेज में कोच सुधीर दास का एक कोचिंग कैंप का आयोजन किया गया था। उक्त कोचिंग कैंप के दौरान ही कोच सुधीर दास द्वारा सुनील सिंह को तेज गेंदबाजी करने के लिए प्रेरित किया गया। इसके पूर्व सुनील सिंह मुख्य रूप से बैटिंग ही करते थे । कैंप ख़तम होने के बाद भी उनके द्वारा तेज गेंदबाजी का अभ्यास जारी रखा गया । उनके भाग्यवश कुछ ही समय बाद पटना यूनिवर्सिटी द्वारा ईस्ट जोन इंटर यूनिवर्सिटी और रोहिंटन बारिया ट्रॉफी का आयोजन किया गया। उक्त प्रतियोगिता में भाग लेने वाली पटना विश्वविद्यालय क्रिकेट टीम के कोच सुधीर दास बनाये गए। इस दौरान सुधीर दास द्वारा सुनील सिंह से जमकर तेज गेंदबाजी का अभ्यास कराया गया।

सुधीर दास के इस प्रयास से सुनील सिंह एक बैट्समैन के साथ-साथ लेफ्ट हैण्ड गेंदबाज के रूप में अधिस्थापित हो गये । इस टूर्नामेंट में पटना विश्वविद्यालय की टीम दूसरे राउंड में बाहर हो गई पर सुनील सिंह ने दोनों मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया और कुल दो परियों में 125 रन बनाये और छह विकेट चटकाये ।

सुनील सिंह ने तेज गेंदबाजी करना जारी रखा। सत्र 1978-79 में जमशेदपुर के खिलाफ शेष बिहार अंडर-22 टीम की ओर से खेलते हुए उन्होंने सात विकेट चटकाये और 54 रन बनाये। मैच शेष बिहार ने जीता। इस परफॉरमेंस के आधार पर सुनील सिंह का चयन बीसीसीआई द्वारा आयोजित होने वाली कर्नल सीके नायडू अंडर-22 क्रिकेट टूर्नामेंट में भाग लेने वाली बिहार टीम में किया गया।

इसी साल पटना विश्वविद्यालय की टीम चैंपियन हुई और उसने रोहिंगटन वारिया ट्रॉफी क्रिकेट टूर्नामेंट में चौथा स्थान हासिल किया। इस टूर्नामेंट में सारे खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। विशेषकर रांची विश्वविद्यालय के खिलाफ सेमी फाइनल और कोल्कता विश्वविद्यालय के खिलाफ फाइनल मैच में उन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन से पटना यूनिवर्सिटी को लगभग हारा हुआ मैच जिताया । ये मैच आज भी क्रिकेट प्रेमियों को याद है। संजय तिवारी और टॉनी लांबा का खेल काफी सराहनीय रहा था।

सुनील सिंह ने वर्धमान विश्वविद्यालय के खिलाफ क्वार्टरफाइनल, रांची विश्वविद्यालय के खिलाफ सेमीफाइनल और कोलकाता विश्वविद्यालय के खिलाफ फाइनल में बेहतर प्रदर्शन किया था। प्रतियोगिता के कुल पांच मैचों की आठ इनिंग में उन्होंने लगभग 425 रन बनाये और 45 विकेट चटकाये। वे कहते हैं पटना विश्वविद्यालय टीम के परफॉरमेंस के लिए अजय दा का कोच व मेंटर के रूप में सराहनीय कार्य रहा था। इसी परफॉरमेंस के आधार पर उनका चयन विजी ट्रॉफी में भाग लेने वाली ईस्ट जोन विश्वविद्यालय टीम में हुआ। कोलकाता में हुए इस टूर्नामेंट में ईस्टजोन की टीम सेमीफाइनल में नार्थ जोन से हार गई। नार्थ जोन की टीम में कीर्ति आजाद, सुनील वाल्सन, करण दूबे, रमण लांबा जैसे दिग्गज खिलाड़ी थे। इस टूर्नामेंट में सुनील सिंह ने दो विकेट लिये और कुल 100 रन बनाये।


अगले सीजन 1979-80 में पटना विश्वविद्यालय ने अपना खिताब बरकरार रखा। इसके दौरान पटना यूनिवर्सिटी ने कुल तीन मैच खेले और फाइनल मैच में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को हराकर विजेता बना । कुल तीन मैच के तीन पारी में उनके द्वारा लगभग 300 (एक सैंकड़ा सहित) रन बनाया गया और कुल 15 विकेट लिया गया। उन्होंने फाइनल में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के खिलाफ खेले गए मैच में कुल दस विकेट लिए और पटना विश्वविद्यालय की टीम चैंपियन बनी। इसी साल रांची में खेले गए हेमन ट्रॉफी अंतर जिला क्रिकेट टूर्नामेंट में उन्होंने छह विकेट चटकाये और पटना जिला टीम रांची को हरा कर चैंपियन बनी। विश्वविद्यालय टूर्नामेंट और अंतर जिला टूर्नामेंट में किये गए परफॉरमेंस के आधार पर सुनील सिंह का चयन बिहार रणजी टीम में हुआ परन्तु उन्हें मुंबई (तब बंबई) के खिलाफ खेले गए मैच में खेलने का मौका नही मिला पर वर्तमान में भारतीय टीम के कोच रवि शास्त्री ने बंबई की ओर से अपना रणजी डेब्यू मैच खेला।


सत्र 1980-81 में उन्होंने मेकॉन रांची को स्टाइपन प्लेयर के रूप में ज्वाइन कर लिया। इसी साल बिहार अंडर-22 क्रिकेट टीम के कप्तान बनाये गए। उन्होंने इसी साल ईस्ट जोन की ओर से इंटर जोनल अंडर-22 क्रिकेट टूर्नामेंट (कटक) भी खेला। इस साल पटना विश्वविद्यालय की ओर से खेला। भागलपुर में हुए ईस्ट जोन अंतर विश्वविद्यालय क्रिकेट टूर्नामेंट में पटना विश्वविद्यालय की टीम फाइनल में कोलकाता विश्वविद्यालय से हार गई। हैदराबाद में इंटर जोनल विश्वविद्यालय क्रिकेट टूर्नामेंट में पूर्व क्षेत्र की ओर से खेलते हुए नार्थ जोन के खिलाफ सुनील सिंह ने दो विकेट चटकाये व 75 रन बनाये।

सुनील सिंह एक बार बिहार रणजी टीम में जगह बनाने में सफल रहे पर खेलने का मौका नहीं मिला। मेकॉन की ओर खेलते हुए रांची क्रिकेट लीग में उन्होंने फाइनल मुकाबले में सात विकेट चटकाये। इसी साल रांची ने पटना को हरा कर हेमन ट्रॉफी का खिताब वर्षों बाद जीता। उन्होंने इस साल हेमन ट्रॉफी में तीन परियों में दो शतक समेत 300 रन बनाये और दो इनिंग में दस विकेट चटकाये।


वर्ष 1982-83 में एक बार फिर पटना विश्वविद्यालय की टीम ईस्ट जोन की चैंपियन बनी और रोहिंटन बारिया ट्रॉफी में तीसरा स्थान हासिल किया। रोहिंटन बारिया ट्रॉफी के सेमी फाइनल मैच जो की दिल्ली विश्वविद्यालय के खिलाफ खेला गया था इस मैच में सुनील सिंह ने महज 40-42 रन देकर 7 विकेट चटकाए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के टीम में मनोज प्रभाकर, संजीव शर्मा, गुरुशरण सिंह, तिलक राज, भाष्कर पिल्लई, राजू सेठी जैसे खिलाडी थे । पूरी प्रतियोगिता में उन्होंने कुल 43 विकेट चटकाये और 350 रन बनाये। इसी वर्ष उन्होंने विजी ट्रॉफी में ईस्ट जोन का नेतृत्व किया और नार्थ जोन के खिलाफ कुल तीन विकेट लिये और कुल 118 रन बनाये। बंबई में हुए इस मुकाबले में नार्थ जोन से ईस्ट जोन हार गया। इसी साल आखिरकार सुनील सिंह ने रणजी ट्रॉफी डेब्यू मैच खेल लिया। बंगाल और ओड़िशा के खिलाफ हुए मैच में उन्हें खेलने का मौका मिला। श्री सिंह वर्ष 1979-80 से 1991 तक बिहार रणजी टीम के सदस्य रहे इसके अतिरिक्त उन्होंने 1982-83, 1987-88 में BCCI द्वारा आयोजित Wills Trophy एकदिवसीय प्रतियोगिता मैच में भी भाग लिया। वर्ष 1981 में उन्होंने बिहार स्टेट इलेक्ट्रिक बोर्ड (बिहार स्टेट पॉवर होल्डिंग कंपनी लि.) में मस्टर रोल के रूप में ज्वाइन किया। अपने ऑफिस की ओर से खेलते हुए कई टूर्नामेंट में चैंपियन बनाया। पटना लीग में टीम का दबदबा रहा।

पटना जिला क्रिकेट जिससे वे 50 वर्षों से जुड़े हुए है उसके आज की स्थिति से वे काफी दुखी है । उनका कहना है की एक समय था जब बिहार टीम में अधिकांश खिलाडी पटना जिला के हुआ करते थे परन्तु आज पटना जिला क्रिकेट का स्तर दिनों दिन निचे जा रहा है। उनके जमाने में लीग एवं अन्य टूर्नामेंटों को मिला कर पटना में लगभग 60-70 मैच एक सीजन में एक प्लेयर खेल लिया करता था परन्तु कालांतर में कई टूर्नामेंट का आयोजन बंद हों गया तथा लीग का भीं आयोजन नियमित नही होने के कारण मैचों की संख्या सिमित हो गयी है। हाल के वर्षों में लीग का स्तर भी गिरा है। आमंत्रण टूर्नामेंट भी न के बराबर होते हैं। पटना क्रिकेट के रहनुमाओं को सोचना होगा ताकि हम अपना गोल्डन जुबली समारोह वर्ष 2022 में शानदार पूर्वक मना सकें।

वे पटना जिला के पूर्व व वर्तमान क्रिकेटरों से अपील करते हुए कहते हैं कि आप आगे आये और अपनी खोई हुई गरिमा को वापस लायें। यूँ तो सुनील सिंह ने प्रथम श्रेणी के क्रिकेट से वर्ष 1992 में रिटायरमेंट ले लिया परन्तु पटना लीग में अभी तक सक्रिय रूप से खेलते आ रहे है. खेल के प्रति उनके जूनून ही है की वे 61 वर्ष की उम्र में भी अपने से आधे से भी कम खिलाडियों के साथ खेल रहे हैं और अच्छा प्रदर्शन भी कर रहे है। अपने सेवनिर्वती से कुछ माह पूर्व अपने ऑफिस टीम बिहार स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड जिसके लिए वो लगभग 50 वर्षो से खेल रहे है को अपने नेतृत्व में आल इंडिया अन्तर स्टेट इलेक्ट्रिसिटी प्रतियोगिता में उप विजेता बनाने का गौरव हासिल किया. ये क्रिकेट के प्रति उनका समर्पण और पैशन ही है जिसके कारण वो 50 वर्षों से क्रिकेट सक्रिय रूप से खेल रहे है और अपने से काफी कम उम्र के खिलाडियों के साथ कम्पीट कर रहे है।


वे कहते हैं कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी चाहिए। चयन का आधार क्षेत्रवाद से हटकर प्रदर्शन होना चाहिए। हर ग्रुप में बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को टीम में मौका मिले चाहे वह राज्य के किसी क्षेत्र से ताल्लुक क्यों नहीं रखता हो।
सभी क्रिकेट प्रेमि जिन्होंने सुनील सिंह को खेलते हुए देखा है उनके अनुसार इनमे जितनीं प्रतिभा थी और जिस प्रकार का इनका प्रदर्शन रहा उस आधार पर इन्हें काफी ऊपर जाना चाहिए था। अपने 50 साल के खेल के अनुभव के आधार पर उनका स्पष्ट विचार है की चयन प्रकिर्या में पारदर्शिता होनी चाहिए और चयन का आधार केवल खिलाडियों की क्षमता एवं प्रदर्शन होना चाहिए।

बिहार के बंटबारे के बाद सत्र 2001-02 में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) द्वारा उन्हें चयनकर्ता नियुक्त किया गया था। इस कमेटी में अशोक मल्होत्रा, रणधीर सिंह और सबा करीम भी थे। यह समिति बिहार व झारखंड टीम के चयन के लिए बनी थी। वर्ष 2004-05 में झारखंड क्रिकेट एसोसएिशन द्वारा उन्हें सीनियर सेलेक्टर नियुक्त किया। वर्ष 2006-07, 08 में दलीप ट्रॉफी, रणजी ट्रॉफी वनड, कर्नल सीके नायडू के घरेलू मैचों में मैच रेफरी नियुक्त किये गए। उन्होंने वर्ष 1995 में भारतीय बेसबाल टीम का एशिया चैंपियनशिप (फिलीपिंस) में प्रतिनिधित्व किया। इस टूर्नामेंट में भारत ने कांस्य पदक जीता था।


सुनील सिंह का शतरंज से भी गहरा लगाव था। वर्ष 1978 में हैदराबाद में खेली गई ऑल इंडिया विश्वविद्यालय शतरंज प्रतियोगिता में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। इस प्रतियोगिता में पीयू की टीम उपविजेता रही। उन्होंने स्कूल और कॉलेज हॉकी टीम का भी नेतृत्व किया है।


बिहार क्रिकेट संघ के पूर्व सचिव अजय नारायण शर्मा के शब्दों में सुनील एक बहुत ही जीवट और लड़ाकू प्लेयर थे हार मानने को कभी तैयार नहीं होते थे।

जब विराटनगर में हुई सुनील सिंह की जय-जयकार
वर्ष 1990 में नेपाल में इनविटेशनल टूर्नामेंट खेलने विद्युत बोर्ड की टीम गई हुई थी। फाइनल मैच में सुनील सिंह का बल्ला चौके-छक्कों की बरसात कर रहा था। इनके चौके-छक्के पर सट्टा लगने लगा था। टीम ने जीत हासिल की। पूरा विराटनगर सुनील के पीछे बैंड के साथ उनकी-उनकी जय-जय कार करते हुए चल पड़ा और होटल तक पहुंचाया।

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