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काश! आज यह डाक्टर होता तो बिहार की स्थिति कुछ और होती, जानिए उनके बारे में

शैलेंद्र कुमार
पटना। काश! डॉ अजय भगत जी आज जिंदा होते थे तो पटना ही नहीं बल्कि बिहार क्रिकेट की दशा और दिशा ही कुछ और होती। क्या व्यक्ति थे। गजब की प्रशासनिक क्षमता थी उस शख्स में। कुशल स्वभाव और नेक दिल इंसान, सबों का चहेता था और क्रिकेट के विकास के लिए हमेशा आगे रहता था। तभी तो राजधानी में जितने भी क्रिकेट के बड़े आयोजन अब तक हुए उसमें भगत जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ऐसी चर्चाएं हमेशा क्रिकेट की महफिलों में होती रहती है। तो आइए जानते हैं इस क्रिकेट प्रशासक के बारें में-


पंजाब के लुधियाना शहर में छह अक्टूबर 1946 को जन्मे स्व.डॉ अजय भगत के पिता स्व. केके भगत राजधानी पटना में व्यवसाय करने के इरादे से आये थे और इन्हीं बस गए। स्व. अजय भगत के बड़े भाई विनोद भगत अब इस दुनिया में नहीं। उनके मंझले भाई विजय भगत राजधानी में अपना कारोबार कर रहे हैं। स्व. अजय भगत के पुत्र डॉ अभिनव भगत ह्यदय रोग के डॉक्टर हैं और राजेंद्रनगर स्टेडियम के सामने अपना क्लिनिक चलाते हैं।

अपने तीन भाईयों में सबसे छोटे अजय भगत बचपन से ही मोटे थे। उनका शरीर और मधुर स्वभाव सबको आकर्षित कर लेता था। उनकी शुरुआती शिक्षा संत जेवियर स्कूल में हुई लेकिन आठवीं कक्षा वे पटना कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ने आ गए। इसी स्कूल में पूर्वी क्षेत्र क्रिकेट टीम के चयनकर्ता अधिकारी मदन मोहन प्रसाद से उनकी दोस्ती हुई । दोनों को क्रिकेट का जूनुन था इसीलिए दोनों में मधुर संबंध थे। अधिकारी जी ने पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि टुन्नी (अजय भगत का घरेलू नाम) शुरू से मोटा था। साइकिल पर आगे मुझे बिठाकर घर छोड़ता था। हम दोनों को दिक्कत होती थी लेकिन टुन्नी हमें साइकिल से कभी नहीं उतारता था।


सन् 1962 में डॉ अजय भगत ने मैट्रिक की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की। इन्हें सायंस कॉलेज में प्रवेश मिला। फिर पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की परीक्षा पास की।


स्व. भगत ने पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट में भी अलग स्थान बनाते चले गए। वे लेम्ब्रेटा स्कूटर पर अकेले सवारी किया करते थे। अपने भारी डील-डौल शरीर के कारण शहर में हर कोई पहचानता था। कोई सोच नहीं सकता था कि इतना भारी भरकम शरीर का स्वामी क्रिकेट भी खेल सकता है। उनके शॉट में शरीर का पॉवर दिखाई देता था। उनके द्वारा लगाया गया शॉट सीधे ग्राउंड को पार कर जाता था। वे स्व. रमेश सक्सेना और जीआर विश्वनाथ की तरह ग्राउंडेड शॉट लगाते थे।

पॉवरफुल स्ट्रोक के मालिक रहे स्व. भगत ने पटना सीनियर डिवीजन क्रिकेट लीग में अलग पहचान बनायी। उन्होंने 1967-68 सत्र में कुल 1272 रन 16 पारियों में बनाये। इनकी धुआंधार बैटिंग की चर्चा खूब होने लगी। नतीजा हुआ कि जमशेदपुर में कार्यरत बिहार क्रिकेट संघ के चयनकर्ता भी चौके। वे भी मजबूर हो गए और डॉ अजय भगत का चयन बिहार रणजी टीम में 1969-70 सत्र के लिए किया था। स्व. भगत स्लीप के अच्छे क्षेत्ररक्षक भी थे। रनिंग बिटबीन विकेट गजब का था। कोई कह नहीं सकता था कि वे एक रन दौड़ कर भी बना सकते हैं।


सौम्य स्वभाव के स्वामी रहे स्व. डॉ अजय भगत अपने स्टेमिना के दम पर समकालीन क्रिकेटरों के छक्के छुड़ाए थे। उनमें एक गुण था जिससे उनकी महानता दिखती थी है, वे हमेशा छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर जाते थे। उन्होंने अपने भारी शरीर को कभी भी कर्मक्षेत्र में बाधा नहीं बनने दिया था।


वे अदम्य इच्छाशक्ति रखने वाले इंसान थे। वे लॉन टेनिस व बिलियड्र्स के अच्छे खिलाड़ी थे। लॉन टेनिस में अपने समय में बिहार जूनियर वर्ग में दूसरे नंबर पर थे। बिलियड्र्स के कई खिताब अपने नाम किये थे। असंभव को संभव कर दिखाने में स्व. भगत माहिर थे।


पीएमसीएच कॉलेज ब्लू के साथ पटना विश्वविद्यालय कलर का सम्मान भी इन्हें प्रदान किया गया था। उन्होंने खेल के साथ-साथ अपने चिकित्सा पेशे के साथ भी पूरा न्याय किया था। स्व. भगत पीएमसीएच मेडिसिन विभाग के रजिस्टार थे। वे मरीज देखने से घबराते नहीं थे। उन्होंने आगे चलकर चिकित्सा के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल कर टीबी और कालाजार के इलाज में अलग स्थान बनाया था। वे बहुत दिनों तक धनबाद मेडिकल कॉलेज में पदस्थापित रहे।

खेल से लगाव होने के कारण वर्ष 1975 में सन्यास ग्रहण करने के बाद भी जुड़े रहे। सन् 1974 में ब्रिटेन जाकर स्पोट्र्स मेडिसीन में डिप्लोमा किया। इसी डिप्लोमा की बदौलत स्व. भगत बैंकाक एशियाई खेल (वर्ष 1978) में भारतीय दल के साथ एक डॉक्टर के रूप में गए थे।
खेल ने उन्हें ऊंचाई पर पहुंचाया था। इसीलिए वे जीवन के अंतिम क्षण तक खेल से जुड़े रहे। स्व. कुमार तारानंद सिन्हा के नेतृत्व में 1970-80 के दशक में आयोजित हुए राष्ट्रीय बिलियड्र्स व स्नूकर चैंपियनशिप के आयोजन सचिव रहे। 1972 में स्थापित पटना जिला क्रिकेट संघ के संस्थापक सचिव रहे। वे पीडीसीए की वोट राजनीति से ऊपर उठकर इसे सशक्त व करोड़पति संस्था बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।


पटना जिला क्रिकेट संघ द्वारा अब तक जीतने भी बड़े आयोजन हुए यथा विश्व कप क्रिकेट के दो आयोजन, हीरो कप, अंडर-19 भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज की मेजबानी पटना में हुई सभी के आयोजन सचिव स्व. डॉ अजय भगत ही थे। उन्हीं के कारण खेलप्रेमी पूर्व आईएएस अधिकारी जीएस कंग पीडीसीए के साथ जुड़े। उनकी पैठ राज्य के प्रशासनिक हलकों में काफी थी। वे सात सालों तक बिहार रणजी टीम के चयनकर्ता भी रहे।


बिहार के नामी स्कूली क्रिकेट टूर्नामेंट ऑल इंडिया सुखदेव नारायण मेमोरियल इंटर स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट को ऊंचाईयों पर पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

एनवाईके सीसी के अरुण कुमार सिंह ने बताते हैं कि डॉ अजय भगत ने अपना अंतिम मैच एनवाईके सीसी की ओर खेला था। यह पटना जूनियर डिवीजन क्रिकेट लीग का फाइनल मुकाबला था। करविगहिया के खिलाफ खेले गए इस मैच में एनवाईके सीसी चैंपियन बना था। डॉ अजय भगत ने 15 रन बनाये थे जिसमें तीन चौका शामिल था।


उनके सागिर्द बताते हैं कि उन्हें चिनियाबादाम खाने का बहुत शौक था। ट्रेन में चिनियाबादाम खाते-खाते धनबाद का सफर पूरा कर लेते थे। उनकी ख्याति का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी अंतिम यात्रा में राजेंद्रनगर से बांसघाट तक तकरीबन उनके चाहने वालों का हुजूम चल पड़ा था। इसका कारण यह था कि वे समाज के लिए थे और समाज उनका था।भले ही वे आज हम सबों के बीच ना हो मगर वे खेल जगत के हर एक के दिल में जिंदा है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को सादर सलाम।

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