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ताहिर साहब ने लाइंसमैन का फ्लैग थमाया और शुरू हो गया इनका फुटबॉल रेफरी के रूप में सुहाना सफर

जितेंद्र कुमार सिंह ‘जॉनी
पटना। वर्ष 1974 की बात है। डीबी शास्त्री फुटबॉल टूर्नामेंट का मैच चल रहा था। लाइंसमैन नहीं आया था। ताहिर साहब ने कहा कि आप ही क्यों आज लाइंसमैन का काम कर देते हैं। सीनियर व्यक्ति थे बात टाली नहीं जा सकती थी सो फ्लैग संभाला और फिर क्या था शुरू हो गया इनका निर्णायक के रूप में इनका कैरियर। यह कहानी है ग्यासुल हक का फुटबॉल रेफरी बनने का। इसके बाद ग्यासुल हक इस क्षेत्र में आगे बढ़ते गए और खूब नाम कमाया। तो आइए सीनियर फुटबॉल रेफरी जितेंद्र कुमार सिंह ‘जॉनी’ की कलम से जानते हैं इनके बारे में-

वर्ष 1957 में पटना में जन्मे ग्यासुल हक ने 1974 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और बीएन कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। उन्होंने अपने खेल जीवन की शुरुआत नेताजी एथलेटिक क्लब और पटना फुटबॉल क्लब की ओर से खेल कर किया। न केवल फुटबॉल बल्कि वे पटना क्रिकेट लीग में भी खेला। बीएन कॉलेज और ईआरसीसी की ओर पटना क्रिकेट लीग में हिस्सा लिया।

वर्ष 1974 की बात है। डीबी शास्त्री फुटबॉल टूर्नामेंट का मैच चल रहा था। मैच में एक लाइंसमैन नहीं आये थे। ताहिर हुसैन साहब ने कहा कि आप तो फुटबॉल के खिलाड़ी हैं। नियमों को जानते हैं तो क्यों नहीं लाइंसमैन का भार आज संभाल लेते हैं और इन्हीं से उनके फुटबॉल रेफरी कैरियर की शुरुआत हो गई।

वर्ष 1976 में पटना में हुए संतोष ट्रॉफी के दौरान बंगाल के अंतरराष्ट्रीय रेफरी दिलीप सेन व ताहिर हुसैन के सुपरविजन से बहुत कुछ सीखा। इस टूर्नामेंट के दौरान वे लाइजिंग ऑफिसर के रूप में टीम के साथ जुड़े हुए थे।

वर्ष 1982 में राज्यस्तरीय और वर्ष 1989 में राष्ट्रीय स्तर का रेफरी बने। इनके साथ विजय कुमार सिन्हा और वाईएन पंडित भी राष्ट्रीय रेफरी बने थे। राष्ट्रीय रेफरी बनने के बाद इनकी पहली पोस्टिंग डॉ बीसी राय ट्रॉफी अंडर-16 फुटबॉल टूर्नामेंट के दौरान संबलपुर में हुई। 1990 में धनबाद में आयोजित पूर्वी क्षेत्र संतोष ट्रॉफी के मैचों संचालन किया और बंगाल व असम के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले का भी संचालन किया।

वर्ष 1990 में पहली बार बिहार के प्रथम रेफरी हुए जिन्हें फीफा रेफरी के लिए बेंगलुरु में हुए फिजिकल टेस्ट के लिए बुलाया गया।
अपने रेफरी के रूप में कैरियर के दौरान संजय गांधी गोल्ड कप, कर्पूरी ठाकुर गोल्ड कप, श्रीकृष्ण गोल्ड कप, बोकारो स्टील कप, कार्तिक उरांव कप (गुमल), सिलुआ आमंत्रण कप, धनबाद व अनेक राज्य व राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट का संचालन किया।

वे बिहार फुटबॉल एसोसिएशन के सहायक सचिव के पद पर वर्ष 1994 से 2008 तक रहे। बिहार फुटबॉल रेफरी व अंपायर एसोसिएशन के संयुक्त सचिव रहे। इस पद पर वर्ष 1985 से 2006 तक रहे। वर्ष 1996 में ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के रेफरी इंस्ट्रक्टर नियुक्त किये गए। इस दौरान इनके अच्छे कार्य को देखते ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने वर्ष 2001 से 2005 तक अपने निर्णायक समिति में सदस्य के रूप में मनोनित किया। यह सम्मान पाने वाले बिहार के एकमात्र निर्णायक हैं।

राष्ट्रीय रेफरी बनने के बाद इस क्षेत्र की जानकारी हासिल करने की इनकी ललक काफी बढ़ गई और वे नियमों की किताबों का अध्ययन करना शुरू कर दिया। नई जानकारियों से हमेशा जुड़े रहने का प्रयास किया। इनकी इस खासियत के मिलन दत्ता (तत्कालीन एशियन रेफरी बोर्ड के सदस्य), प्रदीप नाग, एलएन घोष और रुबी बनर्जी जैसे बड़े रेफरी इनका लोहा मानते थे।

इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बिहार से शांति गोपाल दास, महादेव घोष, एस सुजाउद्दीन, नवीन सुंडी, सुरेंद्र बहादुर सिंह जैसे अनके राष्ट्रीय रेफरी बने और विनोद कुमार सिंह को अंतरराष्ट्रीय रेफरी का दर्जा प्राप्त हुआ।

मैच कमिश्नर और इंस्ट्रक्टर के रूप में इन्होंने ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के द्वारा अनेक राज्यों में कई राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट जैसे नेशनल लीग, संतोष ट्रॉफी, अंडर-21 नेशन टूर्नामेंट जोकि मुंबई, गोवा, बंगाल, हिमाचलप्रदेश, कश्मीर, मणिपुर, असम, दिल्ली आदि में आयोजित किया गया था में मनोनित किया गया।

कहते हैं कि हर किसी की सभी ख्वाहिशें पूरी नहीं होती। उनकी भी एक तमन्ना थी। ग्यासुल हक को आज भी इस बात का अफसोस है कि एक अच्छा रेफरी होने के बावजूद उनको फीफा बैज नहीं मिल सका। यहां किस्मत ने दगा दिया और वर्ष 1990 में फीफा के फिजिकल टेस्ट के दौरान तबीयत खराब होने के कारण यह सपना अधूरा रह गया। बिहार के फुटबॉल रेफरी आज भी उनसे टिप्स लेते रहते हैं।

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